मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

शशिलता पाण्डेय जी द्वारा खूबसूरत रचना#

ऊँची दुकान फीके पकवान
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वादे किये थे बड़े-बड़े,
तुम मुझें वोट दो हम तुम्हे।
अच्छे दिन दिखलाएंगे,
अब तो दुर्दिन बीत गयें ।
अब अच्छे दिन आएंगे,
दुर्दिन पर दुर्दिन बीत गए।
अब अच्छे दिन कब आएँगे?
ऊँची दुकान की फीकी पकवान,
कड़वी दवाई के नाम खिलाएंगे।
महँगाई सुरसा सी बनी हुई ,
सुखी रोटी पर दिन बिताएंगे।
आलू पचास रुपये किलो,
महँगे प्याज आँसू कबतक बहायेंगे?
ऊँची दुकान की फीकी पकवान,
कबतक कड़वी दवाई पिलायेंगे।
दुर्दिन पर दुर्दिन बीत गयें,
अब अच्छे दिन कब आएंगे?
पाँच वर्ष के बाद कुछ दिन,
रसमलाई भाषण की खाएंगे।
और थोड़े दिन अच्छे माल उड़ाएंगे।
दुर्दिन पर दुर्दिन बीत गए,
अब अच्छे दिन कब आएंगे?
ऊँची दुकान की फीकी पकवान,
कबतक हमे कड़वी दवाई खिलाएंगे।
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स्वरचित और मौलिक
सर्वधिकार सुरक्षित
कवयित्री-शशिलता पाण्डेय

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