शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

कवयित्री शशिलता पाण्डेय द्वारा 'हमने किसी को आजमाया नहीं' विषय पर रचना

हमने किसी को आजमाया नहीं,,,
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हमनें किसी को आजमाया नहीं,,,,,
प्यार और वफ़ा मैनें दिल से दिया।
बदले वफ़ा के वेवफाई ही मिली,
आज़माने चली मन को भाया  नही।
देखते-देखते उम्र सारी निकल गई,
इंसानों सा दिल कही पाया नही।
खुदगर्जी में डूबा ये सारा जमाना,
हमदर्द कोई मिला अपना नही।
दर्दे-ए-दिल की दवा मिलेगी कहाँ,
गम तो देनेवाले सगे है पराये नही।
हर रिश्तों का सौदा होता है यहाँ,
यहाँ दौलत की कीमत इंसानो की नही।
आजमाए जाते है अनजाने-बेगाने,
दंश देते भुजंग आस्तीन में छुपकर कहीँ।
अपनी दिल की कसौटी पर तौला जिन्हें,
छद्मवेषधारी दिल का काला निकला वहीं।
कुछ लोग रिश्तों की चादर लपेटे हुए,
असलियत रखते छुपाकर अंदर कहीँ।
तनमन से करते भरोसा हम अपनों पर,
हमनें किसी को आजमाया नही।
अपनो से जब चोट अपने दिल पर लगी,
शर्म के मारे किसी को बताया नही।
हम दयालु कोमल दिल के इंसान,
कभी हमने किसी को सताया नही।
हम इंसान है इंसानो के प्रति कोई भाव,
शिकवा-गिला या नफरत सजाया नही।
अदम्य सत्यमार्ग पर हम डटकर खड़े,
संघर्षों ने हमे मार्ग से हटाया नही।
अब संवेदना भी दब गई स्वार्थ में,
मतलब के बिना कोई रिश्ता नही।
करें कैसे भरोसा किसी भी रिश्तों का हम,
माँ-बाप भी रखे जाते वृद्धाश्रम में कहीं।
हर सुख-चैन गवांया जिनके लिए,
वो भी अपने सगे हुए ही नहीं ।
जिन्दगी तो है कुछ दिन का सफर,
इसलिए किसी से अपनापन जताया नही।
जैसे-तैसे बीत गई अपनी आधी उम्र,
इंसान और इंसानियत पाया नहीं कहीं।
रिश्तों के भरम में गुजरा जिन्दगी का सफर,
अबतक हमने किसी को आजमाया नही,,,,,।
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स्वरचित और मौलिक
सर्वधिकार सुरक्षित
कवयित्री:-शशिलता पाण्डेय
बलिया(उत्तर प्रदेश)

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