गुरुवार, 26 नवंबर 2020

कलम और तलवार# प्रकाश कुमार मधुबनी"चंदन जी द्वारा लघुकथा#

*स्वरचित रचना*

*कलम और तलवार*
रमा :सुनो जी सोचती हूँ मैं तुम्हारे द्वारा दिये गए कलम को बेच दू। क्या फायदा उस कलम का जो तुमने मुझे शादी के रात भेट स्वरूप दिया था। मैं कहती हूँ चांदी की है तो क्या कलम में वो ताकत नही जो आजकल तलवारों में है पत्नी ने अपने बालों को सवारते हुए कहा। पति बिस्तर पर बैठा हुआ था पति(शिवशंकर) बोला कि सो अनुज की माँ याद भी है या तुम भूल गई कि ये कलम मैने तुम्हे आभूषण समझकर नही किसी उद्देश्य हेतु दिया था। अरे चांदी का कलम देना तो एक ठाठ बाठ की बात अलग है  किन्तु मैंने तो तुम्हे उस दिन साफ साफ कह दिया था कि तुम मेरी पत्नी हो मेरे आधी किश्मत, और तुम मेरी शक्ति हो साथ ही साथ मेरे वंश को आगे बढाने वाली है। यही सोच कर मैंने तुम्हें ये भेट दिया था। तुम गलत सोचने लगी हो।माना बड़ा बेटा पिंटू पढ़ लिख के अमेरिका बस गया इससे तुम्हे पढ़ने लिखने से छिड़ हो गया है किंतु सोचों की यदि हमने पिंटू जो कि हमारा इक लोटा बेटा है उसको नही पढ़ाया होता तो क्या होता जो वो लुटेरा बन जाता या मजदूर की जिंदगी गुजारता।फिर तुम्हारे अन्तःमन को नही कचोटता बताओ जरा।रामा ने कहा पिंटू के पापा छोड़ो भी आज भी बड़े बड़े जंग तलवारों से लड़े जाते है किंतु कलम से क्या।शिवशंकर मुस्कुराते हुए बोले किन्तु कितना भी हथियार हो बिना बुद्धि के जंग जीतना सम्भव नही। आखिरकार रमा ने हाथ जोड़ लिए की बिना कलम के जिंदगी सरल नही।तभी बाहर से दरवाजे से घण्टी बजने की आवाज आई। रमा बोली ये देखों अब कौन आ गया। शिवशंकर मुस्कुराते हुए बोले देखो एक पति पत्नि की बातों में कौन खलल डालने आ गया। राम बोली देखो आप भी ना।चलो आप लेटे रहो मैं देखती हूँ। ये कहते हुए रमा दरवाजा खोली तो आश्चर्य हो गई। दरवाज़े पर पिंटू था बोला माँ मुझे माफ़ कर दो मैं अब अमेरिका हमेशा के लिए छोड़ आया हूँ। रमा के आँखों में खुशी से आँशु आ गए। वह बोली अरे पिंटू के पापा देखीये तो अपना पिंटू आ गया। वैसे ही मानों शिवशंकर के बेजान पैर में जान आ गया वह तुरंत गेट की ओर चलने के लिए खड़े हुए तभी अपने पैरों में पिंटू को पाया। उठो बेटा उठो मैं जानता था कि मेरा पिंटू अपने पिता व माता को छोड़कर दूसरे देश में नही बस जाएगा। अरे पिंटू की मम्मी पिंटू के लिए अब बताओ कौन जीता हंसते हुए शिवशंकर ने पूछा रमा मुस्कुराते हुए बोली आप।

*प्रकाश कुमार मधुबनी"चंदन"*

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