बुधवार, 4 नवंबर 2020

लघुकथा#सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"झज्जर#

कोई आने को है... 
है इंतज़ार कोई आने को है
मैं बेक़रार कोई आने को है
ख़ुश हूँ, चहकता  फिर रहा
ये गुलज़ार कोई आने को है
राहों पे नज़रें टिका रखी है
होके सवार कोई आने को है
तारों में गुफ़्तगू होने लगी है
चाँद के पार कोई आने को है
नहीं जोर चलता दिल पे कोई
चढ़ा ख़ुमार कोई आने को है
हर दिन कोई बीज नया पनपे
नहीं बेज़ार कोई आने को है
चाह दिल में दफ़न है"उड़ता"
यही है प्यार कोई आने को है


स्वरचित मौलिक रचना 


द्वारा - सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"
झज्जर - 124103 (हरियाणा )

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