शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

कवयित्री कु.अनिता ईश्वरदयाल मंत्री द्वारा 'नर-नारी एक दूसरे के पूरक' विषय पर रचना

मंच को नमन
नर-नारी एक दूसरे के पूरक

एक ही नारी,बेटी ,बहन ,भुआ ,पत्नी,
बहू,  ननद , भाभी,मां ,दादी ,नानी ।एसे ही पुरुष बेटा,भाई, चाचा, पति,देवर, पिता,दादा,नाना आदि अनेक रूप में अपना जीवन ज्ञापन करती है।
" *यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र समस्त देवता* "
नारी का मान सम्मान, पूजा जिस परिवार में होती है ।वही देवता भी निवास करते हैं ।भगवान महेश ने अर्धनारीश्वर रूप धारण कर संसार में यह बताया है कि पुरूष न के बिना नारी अधूरी है ।नारी के जीवन में नर का बहुत महत्व है।नर और नारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। नर और नारी वृक्ष के समान है। जिस तरह से वृक्ष हमे फल,फूल और शीतल छाया प्रदान करते हैं ।उसी तरह से नर और नारी भी परिवार को एक कड़ी में बाँधकर रखते हैं ।आज परिवार में कन्या के जन्म को अभिशाप  न मानकर वरदान समझने लगा है ।इसके पीछे पुरुष की ही चाहा है ।पुरूष के  बिना नारी  का कोई वर्चस्व नहीं ।  क्योंकि पुरुष ने ही समझ लिया है कि बेटा बेटी एक ही समान है।कन्या जन्म पर थाली बजाना सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं को चलाना । कन्या जन्म पर उत्सव आयोजित करवाना प्रेरणादायक है। पुरुष ने नारी के सम्मान में  खुद को नतमस्तक कर लिया है।नारी के जन्म से मृत्यु पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया में पुरुष का साथ तो रहता ही है। जन्म लेते ही पिता, दादा ,परदादा के रूप में  सभी स्नेह आशीष देते है । कन्या का जन्म होता है तो पुरूष अपने आपको भाग्यशाली समझता हैं ।जो नारी सम्मान का एक  दृश्य है ।पिता अपने बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए एक मजबूत रक्षा कवच है । बेटी का विद्यालय घर ही है ।और गुरु  पिता *सर्वेषामपि वंद्यानां पिता चैव महागुरु* ;
 *ज्ञान दातु परो वंदयों न भूतो न भविष्यति* ”।* 
सत्यनिष्ठा ,पवित्रता,ईमानदारी , सच्चरित्रता ,दया ,करुणा ,क्षमा , विनम्रता ,मैत्री , सेवा ,त्याग आदि  मानवीय  गुण मनुष्य परिवार मे ही सिखाता है ।इस लिए पिता का कर्तव्य बहुत व्यापक हो जाता है ।सदाचार का पाठ पढाने वाला पिता ही होता है ।कन्या के भविष्य को संवारने के लिए उच्च कोटि की तमिल देना उसे स्वालंबी बनाकर उतारना पुरुष का ही चिंतन है।नारी  बिटिया बनकर पापा  से बहुत स्नेह करती हैं। 
कभी भाई बनकर बहन को साईकल चलाने सीखने में मदद करना। और जब बहन गिर जाए साईकल से तो जमीन पर पैर  मारना ।और बहन की लम्बी आयु की मंगल कामना करना।
 पिता का पुत्री व दादा का पौत्री  के प्रति रुझान लगाओ देखते ही बनता है। आज वैसे ही छोटे परिवार  का बोलबाला है ।कन्या के रूप में बालपन में परदादा,  पिता के प्रति जो  भावनात्मक लगाव बनता है वह जीवन पर्यंत सतत रूप से रहता है।पिता के घर नारी का बालपन किलकारी यों के रूप में खेल  से गूँज उठता है।कन्या पिता के घर में पढाई के साथ साथ घर का काम काज भी सिखाया जाता है ।पिता अपने कर्तव्यो को ध्यान में रखकर बेटी की रुचि ध्यान में रखकर ऊसे सिखाता है ।पिता व भाई का दिल जीत लेती ।आज कन्या के विवाह का विचार आता है तो पुरुष वर्ग का सब्र का बांध टूट कर नैनो से जलधारा के रूप में प्रवाहित होता है ,यह दर्शाता है कि कन्या के रूप में किस तरह नारी कलेजे के टुकड़े के रूप में पुरुष वर्ग में अपनी छाप छोड़ जाती है ।
 *नारी का एक कंगन से दूसरे आंगन तक का सफर है ।* 
तरुणा अवस्थातक ,जब तक पिता के घर में रहती है तब तक उसे स्वावलंबी बनाने का पूरा प्रयास करते है । पिता का कर्तव्य ही समाज को फिर से स्वर्ण कालीन स्थिति मे ले जा सकता है।जब पिता के घर को छोड़कर दूसरे के घर में प्रस्थान करती है तब तक नारी का जीवन सुना था। पिता के घर पर छाप छोड़ कर जाती है। पिता ससुराल की दहलीज पर छोड़ता है।तो नारी के जीवन में बदलाव होता है ।शादी ब्याह कर के एक सद गृहस्थ के रूप मे जीवन यापन करनेकी  प्रेरणा पिता ही देता है । पिता के रक्त से एक अच्छे भविष्य का ही निर्माण होगा ॥
विवाह पश्चात तो महिलाओं पर और पुरूष पर  भी भारी जिम्मेदारी आ जाती है। पति, सास-ससुर, देवर-ननद की सेवा के पश्चात उनके पास अपने लिए समय ही नहीं बचता है।अब उसका सब कुछ याने  अर्थी उठने तक का जीवन इसी घर में गुजरेगा इस घर में आकर नारी जब अपने कार्य से,व्यवहार से ससुराल वालों का दिल जीत लेती है। तो ससुराल में ससुर पिता के रूप में,सास मा के रूप में ,ननंद अच्छी दोस्त के रूप में ,देवर छोटे भाई के रूप में और पति हमसफर , दोस्त बन कर नारी के जीवन को सार्थक बना देता हैं। पुरूष नारी को  अपनत्व , स्नेह ,प्यार, मान सम्मान देता  हैं तो  नारी को पिता के घर से ज्यादा पिया का घर प्रिय लगने लगता है ।नारी अब घर परिवार में अपना सब कुछ न्योछावर कर देती है अर्थी उठने तक का सफर तय करके अपनी हर तरह से कुर्बानी देकर गुजारे हुए लमहों को यादगार बना देती है ।आज पुरुष नारी के कन्धे से कन्धा लगाकर परिवार को सुदृढ़ बनाने के लिए अर्थाजन्ं कर रहाँ है । समाज और देश के आर्थिक सामाजिक शैक्षणिक राजनीतिक धार्मिक ऐसे कई क्षेत्र हैं सभी में पुरूष नारी को प्रोत्साहित कर रहा हैं। नारी के इच्छाओं का सम्मान कर उसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में,खेलों में ,अंतरिक्ष में भी नारी को सक्षम बना रहा है । देवर  बनकर अपने भाभी को माँ का दर्जा दे रहा हैं ।भाभी की खुशियों के लिए अपनी खुशियाँ कुर्बान करता हैं । पुरूष पिता बनकर 
वो अपने बच्चों की परवरिश , पढ़ाई  और उनकी हर इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए कार्य करता है ।माता पिता सभी परिवार को एक ही कड़ी में बाँधकर रखने का  हर संभव  प्रयास करते हैं ।पुरष अपने स्वार्थ से पहले अपने साथी की इच्छाओं को महत्व देता ।अपनेे परिवार के  सुख के लिए समर्पित  रहता हैं ।वो दूसरों की खुशिओं में खुश रहता हैं । घर में नारी और पुरूष माता पिता  के रुप से सम्मान पाकर  दादा दादी , परदादा परदादी, नाना नानी , परनाना परनानी बनकर सफर तय करते है।नारी ,पुरूष जब  दादा दादी ,नाना नानी बनते हैं तो वह अपने पौत्र,पौत्रि, दोयता , दोयती को कहानियाँ सुनाते है। उन्हे मंदिर , बगीचे मे घूमने लेजाते  है । उनके  साथ खेल खेलकर अपना बचपन दोबारा जीते हैं । इस समय के दरम्यान  ही वह पुरुष  नारी के लिए और अपने ही परिवार के लिए समस्त जीवन न्योछावर कर देती है ।नारी ससुराल के आंगन में नवविवाहित के रूप में प्रवेश करती है तो पलक पावडा सु इन्तज़ार किया जाता हैं। और जब अर्थी उठती है तो पुरुष एक अबोध बालक की तरह फूट-फूट कर रोने लगता है। इसी सफर में पुरुष और  नारी  एक दूसरे के  त्याग की ममतामई,करूनामई  ,जिम्मेदारी ,
त्याग, सद्भावना ,सदाचार के हर  पहलू के आगे नतमस्तक होकर सम्मान व आदर भाव प्रकट करता है।
पुरूष जीवन की अहमियत किसी से छिपी नहीं है  पुरूष के  बिना नारी  का जीवन ही नहीं है । पुरूष के बिना  नारी को सँसार का रथ रखना असंभव है। नर और नारी के मिलने से नए  ब्रम्हाण्ड का निर्माण होता है, नई चेतना और खुशी का निर्माण होता है । जीवन भर एक दूसरे का समर्थन करते है।एसे विविध  रिश्तो के रूप में नारी का साथ देता हैं ।पुरूष अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर अपने परिवार को अपनी कार्यशैली से जोड़कर रखता  है । *नारी और पुरुष एक गाड़ी के दो पहिए हैं ।एक के बिना एक अधूरा है ।* 
 
*स्नेह का धागा,*
    **और संवाद की सुई. .. *नारी* 
 **एक उम्मीद, एक आस ... नर* 
 *प्रेम का भंडार हैं नारी* ।
 *बाहर से सख्त, अंदर से नर्म है नर।* 
 *जीवन को अंकुर देती है नारी* ।
 *माँ और बच्चो की पहचान है नर* ।
 *माता पिता का सम्मान है नारी** ।
 *दो धारी तलवार है नर।* 
 *नर  की इज्जत है नारी* ।
 *रिश्तो की शान है नर* ।


कु.अनिता ईश्वरदयाल मंत्री
अमरावती  महाराष्ट्र 
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