शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

कवि निर्दोष जैन द्वारा 'ख्वाइशें' विषय पर रचना

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ख्वाइशें
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दौड़ती-भागती जिन्दगी,
ये ख्वाईशो का दौर है।
रोज सुरसा सी ख्वाईशें,
ये जिंदगी की दौड़ है।
भौतिकता की चाह में,
इंसानियत भी गौण है।
हर रिश्ते अजनबी यहाँ,
रूपयें कमाने की होड़ है।
माँ-बाप भी हुए पराये,
जिन्दगी मशीनों सी दौड़ है
दौलत कमाने की दौड़ में,
सारी दुनियाँ अब व्यस्त है।
सुख सुविधा की दौड़ में,
 रिश्ते भी अस्त-ब्यस्त है।
भूलकर इंसानियत अब,
रिश्ते भी पैसों पर बिकते यहाँ।
 रूपयें-पैसों के मापदंड पर,
 बदलते यहाँ ब्यवहार भी।
अपने माँ-बाप बीमार हो,
चाहे अपने देह से लाचार हो।
औपचारिकता निभाने को,
 अब मोबाइल तैयार है।
 चाचा-चाची दादा-दादी का,
 रिश्ता अब पराया है।
आज के माँ-बाप ने अपने,
बच्चों को यही बतलाया है।
आज के ख्वाइशों के चलते,
बूढ़ी माँ भी लगती आया है।
क्योकि बंगला-गाड़ी की खातिर,
जिन्दगी दौड़-भाग के बिताया है।
ये दौड़ती -भागती जिन्दगी,
ये ख्वाईशो का दौर है।
सारे रिश्तों से होकर बेगाने,
दौलत कमाने में इंसानियत गौण है।
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स्वरचित और मौलिक
सर्वधिकार सुरक्षित
कवयित्री-शशिलता पाण्डेय
बलिया:-(उत्तर प्रदेश)

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