मंगलवार, 24 नवंबर 2020

कवि निर्मल जैन नीर जी द्वारा रचना ‘हिमालय सा’

हिमालय सा....
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पुरूष
हिमालय सा
अडिग
हर परिस्थिति में
अविचल
श्रीफल सा कठोर
मगर भीतर 
कोमल हृदय उसका
बच्चों के लिए
होता खुला आसमान
परिवार की
आन-बान-शान
भीतर लहराता दर्द का
अथाह सागर
फिर भी उसके
चेहरे पर थिरकती
एक प्यारी सी
मीठी सी मुस्कान...!!!

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निर्मल जैन 'नीर'
ऋषभदेव/उदयपुर
राजस्थान

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