बुधवार, 4 नवंबर 2020

शोभा किरण जी द्वारा#सैनिक(लघुकथा)

*राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय बदलाव मंच साप्ताहिक लघु कथा प्रतियोगिता हेतु*

*दिनांक-02/11/2020*

*सैनिक*
सैनिक(लघुकथा)
रमेश बॉर्डर पर सैनिक के रूप में कार्यरत था,कारगिल की लड़ाई में अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए,उसने कई दुश्मनों को मार गिराया था।कई राष्ट्रीय पुरस्कार परमवीर चक्र की घोषणा हुई थी,रमेश को देने के लिए,वो घर लौटने वाला था ।उसने घर फ़ोन किया,अपने माता पिता से कुछ जरूरी बात करनी थी रमेश को।
घंटी बजी.....
मां ने फोन रिसीव किया,कैसा है मेरा बच्चा,    ठीक हूँ मां रमेश ने जवाब दिया।एक इजाजत चाहिए थी मां--    क्या बेटा! पूछ मत आदेश दे।
नहीं मां, मेरा एक दोस्त है उसे अपने साथ लाना चाहता हूँ,  तो ले आ ना पूछने की क्या जरूरत है।
तेरा दोस्त है, तो मेरे बेटे जैसा है।रमेश बोल पड़ा--मां वो अपाहिज हो गया है, लड़ाई में,पैर में गोली लगी,पैर काटने पड़े।और मैंने उससे ये कहा कि मेरे मां बाप तुम्हारी सेवा करेंगे,अपना बेटा समझकर।
हम जरूर करेंगे बेटा, तू उसे लेता आ अपने साथ,जब तक हम जीवित हैं तबतक जरूर देखरेख करेंगे।कब आ रहा है तू?मांँ अधीर होते हुए बोली।
परसो माँ। बहुत इंतज़ार कर बाद वो दिन भी आ गया।मांँ सुबह से ही भाग दौड़ कर रही थी,सारी खाने पीने की चीजें रमेश की पसंद की।पूरा घर पकवान की खुशबुओं से तर था।माँ बार बार दरवाजे पर भी झाँक आती थी।तभी गाड़ी के रुकने की आवाज़ आयी।मां और इसबार पिता भी साथ हो लिए।गाड़ी से बेटे के उतरने की प्रतीक्षा हो रही थी,रमेश ने अपना एक पैर नीचे रखा, मां मुस्कुरा उठी,और दूसरे पैर की जगह एक बैसाखी थी।मां को मानो काटो तो खून नहीं।चीख पड़ी, मेरा बच्चा ये क्या हो गया तुझे ....
मां कुछ नहीं, तेरा बेटा तो ज़िंदा है,सिर्फ पैर शहीद हुआ है,बस।तूने तो अपने दोस्त के लिए कहा था,ये सब कुछ और वो तू ही था!!
हां माँ- मैं तो बस देखना चाहता था,कि मेरे माता पिता मुझ अपाहिज को अपनाते हैं कि नहीं।
कैसी बातें करते हो बेटा ,सैनिक के माता पिता होने से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता।जब कोई भी माता पिता अपने बेटे को देश सेवा में भेजते हैं, वो पहले अपने देश से प्रेम करते हैं।उसके बढ़कर कुछ भी नहीं।हमें गर्व है, अपने बेटे पर।।
थोड़ी ही देर में घर से खिलखिलाने की आवाज़ें गूंज रही थी।

शोभा किरण
जमशेदपुर
झारखंड

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