शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

कवयित्री शशिलता पांडेय द्वारा 'खिड़की' विषय पर रचना

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        खिड़की
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दिल की खिड़की खोल ले प्राणी,
खुली हवा को अंदर आने दे!
उज्ज्वल स्वर्णिम शीतल किरणें को,
खिड़की से प्रकाश छिटकाने दे!
चाँद चमकता नभ के ऊपर,
खिड़की से उसे निरखने दे!
एक चाँद निज मन के अंदर,
उसे धवल चाँदनी सा चमकने दे!
सुविचारों के अंशुमान से हृदय,
 में अलौकिक प्रकाश भरने दे!
दिल की  खिड़की खोल ले प्राणी,
हृदय का घनावरण छंट जाने दे!
मानव हृदय लेकर आया जग में,
मन में सुन्दर भाव जगाने दे!
मनुज-जगत के सुन्दर मन को,
सौरभ- सुमन से महकाने दे!
अपनें संकीर्ण विचारों से पूरित,
मन की दुविधा दूर भगाने दे!
 देख ले खोल दिल की खिड़की ,
धरती पर सुंदर स्वर्ग सजाने दे!
 मिट्टी की इस नश्वर मूरत में,
 जीवन का भाव जगाने दे!
 खोल हृदय के पट रे प्राणी,
 विचार सुन्दर भर जाने दे!
 करके कोई उपक्रम अनूठा,
 जगत में नाम कमाने दे!
निर्मल कर कलुषित मन को,
 निज हृदय को बड़ा बनानें दे!
दिल के अपनें भीतर में,
एक ईश्वर की छवि छुपाने दे!
दुखी- दरिद्र की करकें सेवा,
मानव-तन को सफल बनानें दे!
अपनें ओछे विचारों से ऊपर उठ,
 प्रेम-धारा दिल मे उमड़ने दे!
जीवन के कुछ निश्चित क्षण को,
मानवता की खुशबू से भरने दे!
जन्म-जन्म की मैली चादर से,
गहरे- काले दाग निकलने दे!
अति विकट इस संकट काल मे,
सुविचारों का स्वच्छ पवन बह जाने दे!
निज हृदय-पट खोल ले प्राणी,
मन प्रेम-मगन हो जाने दे!
अप्रतिम सौंदर्य से पुरित जग को,
 हृदय की खिड़की से झांकने दे!
मानव-धर्म सेवा का पवित्र जल को,
मन की खिड़की से छिड़कने दे!
कृष्ण प्रेम-मगन मीराबाई को,
 प्रेमरतन -धन पाने दे!
दिल की खिड़की खोलकर,
 सारे जग का दर्द मिटाने दे!
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    स्वरचित और मौलिक
    सर्वाधिकार सुरक्षित
    कवयित्री-शशिलता पाण्डेय

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