शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

अद्वैत प्रेम जी द्वारा खूबसूरत बेहतरीन रचना#

27/10/2020
ताँका-5-7-5-7-7
विषय-अद्वैत प्रेम
अद्वैत प्रेम
मोहे राधे कृष्ण से,
अद्वैत रुप
बसो मन मंदिर,
दरश तो दिखाओ।

मोर पंख में
तुलसी की माला मे,
राधेकृष्ण हैं
समाहित हर में,
कण-कण में बसे।

मोरे कान्हा जी
नैना तरस रहे
बरस रहे
विरह वेदना से,
अंर्तव्याथा समझो।

आ जाओ मोरे
श्याम सलोने कान्हा
ना तड़पाओ
"योगिता"शरण में
तोहरे गुन गाये।
स्वरचित/मौलिक
अप्रकाशित/सुरक्षित
योगिता चौरसिया
मंडला म.प्र.

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