सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

कवयित्री पूजा परमार सिसोदिया जी द्वारा रचना “घर कही हम हो गया है"

विषय_ घर कहीं हम हो गया है

रोज़ को भाग दौड़ में
घर कहीं गुम हो गया है ।
झूठी खुशियों की आड़ में 
हर रिश्ता गुम हो गया है ।
मत पूछो कितना बड़ा है मेरा मकान
बड़ा दिल कहीं गुम हो गया है ।
साथ बैठ कर खाना
वो चलन भी कहीं गुम हो गया है ।
मजबूत ईंटे है इसकी 
पर मजबूत विश्वास कहीं गुम हो गया है ।
दो पैसे कमाने की तलाश में
इसका सुकून भी गुम हो गया है ।
घर कहीं गुम हो गया है ।

पूजा परमार सिसोदिया
आगरा ( उत्तर प्रदेश)
pujaparmar89@gmail.com

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