शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

कवयित्री स्वेता कुमारी जी द्वारा 'बचपन की यादें' विषय पर रचना

बचपन की यादें

बचपन की यादें कुछ खट्टी कुछ मीठी,
यादों की बारात कुछ ठंडी कुछ अच्छी,
तो चलिए ले चलते हैं आपको आज
बचपन की वो वो यादें निठल्ली।।

वो हरे खेतों में बेबाक घूमना,
वो पेड़ों के नीचे दिन भर खेलना,
तालाबों में कूद कूद कर नहाना,
क्या वो दिन थे हमारे, 
बचपन कि वो यादेँ निठल्ले।।

वो जाता कि आटा, वो गोबर के उपले,
वो मिट्टी की चूल्हे की सोंधी सी खुशबू,
वो मटके का पानी,वो छत पर सो कर करना गुफ्तगू,
ना जाने कब बिता ये बचपन हमारे,
क्या वो दिन थे , बचपन की वो यादें निठल्ले।।

वो कुछ पैसों में ही खुश हो जाना,
वो नानी दादी के अनमोल किस्से सुनना,
वो खटिया पर चैन की नींद सोना,
वो लालटेन की रोशनी में मन लगाकर पढ़ना,
क्या वो दिन थे हमारे, बचपन की वो यादें निठल्ले।।

वो सुबह की चाय रोटी की चुस्की,
वो बाइस्कोप देख कर होना फिल्मी,
लेमनचूस और गन्ने की खुशबू,
वो गिल्ली डंडा और कंचे की गुदगुदी,
क्या वो दिन थे हमारे, बचपन की वो यादें निठल्ले।।


वो बचपन की बारिश, वो बारिश का पानी,
वो कागज की कश्ती, करते हम शैतानी।
क्या वो दिन थे हमारे, बचपन की यादें निठल्ले।।

स्वेता कुमारी
धुर्वा, राँची।

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