शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

सतीश लाखोटियानागपुर, महाराष्ट्र जी द्वारा क्रोध पर बेहतरीन रचना#

क्रोध 
 हाड माँस के हम पुतले
जब से आए धरा पर
अपने बुजुर्गों से
 सुनते आए एक ही बात
 संयम  रखो क्रोध पर
रखो सभी से मधुर व्यवहार


  बड़ों की सलाह
 रहती बिल्कुल नेक
   इतिहास पर नजर डालें तो
 ईश्वर से लेकर
राजा महाराजाओं ने भी
क्रोधित होकर
गलतियाँ  की अनेक

बुद्धि चातुर्य के देवता
गणराया ने भी
चँद्रदेव के हँसने पर
क्रोधित होकर
दे दिया उन्हें 
कलाहीन होने का श्राप

सभी धर्मों के 
ग्रंथों में दर्ज 
महान संतों का वर्णन
भयभीत रहते थे सभी इनसे 
न जाने ये कब 
क्रोधित होकर
डाल दे
श्राप का कोई बंधन

  आओ अब कर लेंते
   हम हमारी ही बात
   हमको सिर्फ अच्छी लगती हमारी तारीफ
गलती किसी ने बताई तो
कभी दिल में, कभी जतलाकर 
हम ही करते
 मुँह बिगाड़ कर बात
यह सौ टके की बात

  क्रोध भी
जीवन का महत्वपूर्ण अंग
 कलयुगी धरा पर  
अल्प ही होंगे
ऐसे अद्भुत, अलौकिक मानव
क्रोध नही जिनके संग

 हम भले ही  
समझे स्वयं को महान
गलतियाँ हमसे भी होती
इस बात का ले हम संज्ञान

न चाहते हुए भी
हम स्वयं पर भी
क्रोधित होते कई बार
 गुस्सा हमारा निकलता
परिजनों संग मित्रों पर
 इस बात से नही 
कर सकते हम इनकार

  कभी-कभी
 क्रोध भी देता अच्छे परिणाम
किसी का कहना
दिल पर लग जाए तो
हम स्वयं ही बनाते
अपनी एक अलग पहचान

मैं अज्ञानी सतीश
समझा नही सकता इसका सार
ईश्वर, संत, महात्माओं ने
भी इसे किया था आत्मसात

कहना बस इतना ही
  हर बात की  
रहती अपनी सीमा
उसी को जेहन में रखकर
कदम बढ़ाओ
जीवन रथ के पहिये के साथ

सतीश लाखोटिया
नागपुर, महाराष्ट्र

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