शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

कवि रूपक जी द्वारा रचना “क्या इंसान जिंदा हैं"

क्या इंसान ही जिंदा है.......

क्या इंसान के अंदर इंसानियत जिंदा भी बचा है?
कैसे समझे की इंसान के रूप में इंसान ही जिंदा है?

पेपर में कुछ और देखने से पहले ही नाबालिक की
 बलात्कार की घटना पर नजर जाता है
फिर कैसे माने की समाज में इंसान के रूप में
 इंसान ही है भेड़िया नहीं है।

दुनिया में इंसान कम और इंसान के रूप में औरत
 को नोचने वाला भेड़िया नजर बहुत ज्यादा आता है
कुछ अच्छी खबर सुनने से पहले ही किसी की
 हत्या की खबर सुनाई  देता है।

अगर इंसान के रूप में इंसान ही जिंदा है तो
फिर क्यों कोई तड़पकर लावारिश की मौत मरता है
कैसे समझे की इंसान के रूप में इंसान ही जिंदा है।

क्या सिर्फ खून के रिश्तों के लिए ही
 अंदर की  इंसानियत जिंदा रहता है
बाकी दूसरे लोगों के वक्त क्यों ?
अंदर की इंसानियत मर जाता है।

किस लालच में तुम दूसरे लोगों की हत्या करते हो
किस कमी की पूर्ति के लिए तुम बलात्कार करते हो
कौन सा जमीनी दुश्मनी के लिए दूसरे इंसान को
तुम लूटते और मारते पीटते हो
किस खुशी के लिए तुम लोगों को तड़पता छोड़ देते हो।

क्या मानव तन पाने का बस यही कर्तव्य रह गया है
की अपने में और अपनो के लिए ही तुम जिंदा रहो
बाकी इंसान को तड़पने छोड़ दो और मरने छोड़ दो।

मारना ही है तो अपने अंदर के रावण को मारो
मरने ना दो अपने भीतर के राम/ इंसानियत को
जिंदा कर दो अपने भीतर के उस इंसानियत को
और बचा लो तड़पते , बेबस और लाचार इंसान को।
©रुपक

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