सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

कवि प्रकाश कुमार मधुबनी “चंदन" जी द्वारा रचना (विषय- कठिन प्रश्न)

*कठिन प्रसन्न*

*स्वरचित रचना*

सुनो राधे जीवन एक व्यापार।
जिससे चलता सदा यह संसार।।
भाव हमारा हो जैसे माखन मिश्री।
प्रेम अनमोल जैसे करते निज श्रृंगार।।

हे माधव मोहनी मूरत सावरी सूरत।
इंसान शैतान बनता कारण जरूरत।।
फिर निज भाव पर लगाए कैसे अंकुश।
मन चंचल जो उपजाए नव नव विचार।।

मोहन आकाश और पाताल क्या।
केवल प्रश्न है फिर हो जवाब क्या।।
हर कठिन प्रश्न से पहले बनता उत्तर।
समस्त प्राणी में है मेरा एकाधिकार।।

हे राधे सुनो मन हमारा जैसे उपवन।
जिसमें होते भाव भिन्न जैसे हो वन।।
सृजन से फूल खिले या उगे नित काँटे।
बोना काटना स्वयं पे निर्भर हो संस्कार।।

हे त्रिलोकी नाथ आपने सत्य बताया।
भटके हुए को है सन्मार्ग दिखलाया।।
सब तरफ है केवल दिखता त्राही त्राही।
फिर कैसे सुंदर बने प्राणियों का शिष्टाचार।।

दूसरों से तो भला हम जीत भी जाये।
परंतु स्वयं को कैसे फिर हम समझाये।।
हे त्रिभुवन जिससे इंसान स्वयं फँसे।
भूल से भी मत फ़ैलाओ ऐसा मायाजाल।।

*प्रकाश कुमार मधुबनी"चंदन"*

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