सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

कवि डॉ. मलकप्पा अलियास महेश जी द्वारा रचना “बेटी"

बदलाव मंच को नमन 

बेटी 

जन्म लिया हूँ बेटी बनकर
घर के सुख संपत्ति का 
थैला भरने |

घर की लाडली हूँ, 
तुतली बातें करते 
तितली बनकर रंग रूप भरने |

माता पिता का गुरूर हूँ, 
बेटी होने का गर्व है, 
एहसास मुझे भी होता है |

लेकिन हो गया क्या आज? 
इस धरा पर बेटा -बेटी में 
अंतर करके आगे बढ़ने नहीं देते 
सभी |

शहर गाँव में बढ रहे हैं 
अबला पर अत्याचार, 
प्रभु को भी नहीं है दया |

सोच रही हूँ क्या पाप किया 
मैंने इस तरह पीडा सहने  |

आज एक होकर लडना 
हैं हमें  बेटी बचाने |
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डॉ मलकप्पा अलियास महेश बेंगलूर कर्नाटक

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