गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

कलम भी #चंचल हरेंद्र वशिष्ट, हिन्दी भाषा शिक्षिका,रंगकर्मी एवं कवयित्री नई दिल्ली जी द्वारा#

कलम भी आज फूट फूट कर रोई है
क्या लिखूं फिर से वही  कुकृत्य ?,
क्या लिखूं बेबसी पीड़िता की?
क्या फिर से लिखूं लचर प्रशासन और सुस्त कानून, 
क्या लिखूं दरिंदगी इन वहशियों की?
क्या यही रह गया लिखने को?
क्या ये वही हिंद नहीं,जहां मैंने लिखी गौरव गाथाएं वीरांगनाओं की और विदुषियों की विद्वता के बखान किए?
तो क्यूं आज मैं समाज की कालिख पर स्याही बिखेरने के काम आती हूं?
क्यूं नहीं टूट जाती मैं ये सब लिखने से पहले?
क्यूं नहीं लिख पाती मैं इन दुष्कर्मियों की सज़ा ए मौत का ऐलान...तुरंत?
क्यूं रुकती, लड़खड़ाती हूं बार बार न्याय दाताओं के हाथ में? 
मैं सिर्फ़ कहानी, किस्से,कविता और लेख लिखने के लिए ही तो नहीं, मैंं इंसाफ़ ,हक, सत्य और सज़ा देने के लिए भी तुम्हारे हाथ में हूं,....
तो क्यूं नहीं लिखते वो जो सच है जो न्याय संगत है ?
इसलिए आज कहती है ये कलम कि कितने भी कुकृत्य लिख लो इनके ,कितनी भी शर्म दिलाओ इन्हें
कितनी भी थू थू करो,कितनी भी सज़ा दिलाओ इन्हें,
अपनी मां का दूध लजाने वालों को लाज कहां आती है?
इनके कुकृत्यों पर तो धरती माँ भी थर्राती है
इन बेशर्मों का केवल एक ही इलाज है
सौंप दो इन्हें ,इनकी सज़ा खुद समाज है
जनता की कोई सुनवाई नहीं,कानून भी लचर है
जनता हिसाब कर देगी तुरंत ही ,पुलिस,कोर्ट सब बेअसर हैं
सालों तक सरकारी राशन मुफ्त उड़ाते रहते ये पड़े पड़े,
फिर भी अनुकूल दण्ड न पाते ये,
उल्टा लटका के नंगा, चमड़ी उतारो 
तड़पने दो इन्हें, जान से न मारो।
चील,कौओं,गिद्धों के सामने छोड़ दो
इनके जिस्म का मांस ऐसे ही नोंचने दो।


चंचल हरेंद्र वशिष्ट, हिन्दी भाषा शिक्षिका,रंगकर्मी एवं कवयित्री
नई दिल्ली

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