शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

कवयित्री सीमा गर्ग मंजरी जी द्वारा रचना

लघुकथा
अजन्मा 

तीन घंटों की लंबी प्रतीक्षा के बाद सोनोग्राफी टैस्ट कराकर अब शिवि घर लौटी तो पीठ में बहुत दर्द था ।
माता पिता की मर्जी के खिलाफ शिवि से विवाह करने वाले मनीष की मानसिकता शिवि समझ नहीं पा रही थी ।ना चाहते हुए भी सासुमाँ की जिद  पर मनीष ने शिवि से सोनोग्राफी कराने का दबाव बनाया था ।
 अब  मनीष की बात मानने के सिवा कोई और चारा भी नहीं था। अत: मन पर पत्थर रख शिवि सासु माँ के साथ अस्पताल चली गई ।

दर्द से राहत मिलने पर सोचते-सोचते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला।
आँख खुलने पर शिवि पानी पीने रसोईघर में पहुँची तो बराबर की बैठक में माँ जी और मनीष की बातें करने की आवाजे आ रही थीं ।

"मनीष! मेरी बात ध्यान से सुन बेटा !"
"टैस्ट तालिका में कन्या भ्रूण है तो हमें शिवि का गर्भपात कराना ही होगा । हमारे पास तो पहले से ही रिंकी है। दो दो लड़कियाँ पैदा कर फालतू की चिंता क्यों बढ़ाना ?"
"अगर लडकी की जगह बेटा होता तो मेरे मन के अरमान निकलते । मैं तो पूरे मुहल्ले में मुँह भर मिठाई बाँटती ।"
बोलते-बोलते पोते की आस में माँ जी के चेहरे पर चमक बिखर गयी ।
"माँ आप बहुत ही फालतू सोचती हैं ।" "आजकल के जमाने में बेटा बेटी बराबर हैं ।अब लोग बेटे बेटी में फर्क नहीं करते । "
मनीष ने माँ को समझाने का प्रयास किया ।

"हाय राम ! फूट गयी मेरी तकदीर"
अरे भगवान ने मुझे इकलौता बेटा तो दिया है । परन्तु तेरे बुढ़ापे के लिए तो वो भी नहीं होगा ।"
कहकर माँ माथे में हाथ मारकर रोने लगी ।
"माँ ! रोने-धोने की क्या बात है इसमें।"
"मेरी कमाई इतनी है कि मै आराम से दो क्या चार लड़कियों की शिक्षा पालन पोषण बहुत अच्छे और बेहतर ढंग से कर सकता हूँ ।"

"और वैसे भी माँ शिवि बहुत संवेदनशील और भावुक है। वो इस बच्चें की माँ है। और मै उसका ये हक नहीं छीन सकता।"
मनीष ने सपाट शब्दों में अपनी बात कह दी । 
"नासपीटे तू तो निरा जोरू का गुलाम ही रहेगा ।"
"अरे मुझे तो तेरा भविष्य अंधकारमय दिख रहा है । "
आखिर माँ के मन का क्रोध जुबान से जहर उगलने लगा ।
माँ की खरी खोटी सुनकर भी मनीष अविचलित रहा । और माँ से साफ शब्दों में अपनी बात रखकर बोला कि--

 "माँ बात जोरू के गुलाम की नही वरन, यहाँ बात मेरे अपने अंश की अपने खून की है। मैं अपने अजन्मे बच्चे पर मौत का साया भी नहीं पड़ने दूँगा । शिवि और मेरा शिशु सलामत रहे ।भले ही वह कुछ भी हो ।
अब आगे हमारे बीच इस विषय पर कोई बात नहीं होगी।
दोनों की पूरी बात सुनकर डाँवाडोल मनःस्थति वाली शिवि की नजरों में मनीष का कद बहुत ऊँचा उठ चुका था।

✍ सीमा गर्ग मंजरी
 मेरी स्वरचित रचना
 मेरठ

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