शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

पर्दा#शशिलता पाण्डेय जी द्वारा बेहतरीन रचना#

पर्दा
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आज मैं हरदम सोचती,
रहती हूँ मौन।
बदलते जमाने की,
कैसी ये रीत?
पर्दे के पीछे छुपे,
चेहरे के पीछे कौन?
फितरत कुछ और,
चेहरे पर झूठी प्रीत।
मुस्कुराते चेहरे के,
पर्दे में छुपा रहस्य।
दिल के अहसास,
समझते सारी बात।
किस पर करे भरोसा,
छद्मवेषधारी मनुष्य।
अपनेपन के पर्दे में छुपा लालच,
रिश्ते की असलियत।
चल रहा अपनेपन के,
पर्दे में रिश्तों का व्यापार।
कोई किसी का सगा नही,
ठगी जाती इंसानियत।
अब यहाँ चलने लगा,
स्वार्थी रिश्तों का दौर।
एक पर्दे में छुपकर,
रहने लगे है लोंगों के चहरे।
दौलतमंद से अपनेपन, 
दौलतहीन वृद्ध माता-पिता से दूर।
आजकल एक झीने से पर्दे का जमाना,
जो देखे दुनियां वहीं दिखाना।
वीभत्स और नीच कृत्यों के,
अपने रंगीन पर्दे में दाग छुपाकर।
करे अब जमाने मेअब किसपर एतबार?
अजनबी परायो की कौन कहे?
अपनो के भी चेहरे के मुखौटे हजार।
कोई देता धोखा संत और बाबा बनकर,
पर्दे के पीछे दुश्चरित्रो का संसार।
अब साधू-संत जंगल, पर्वत पर नही,
पर्दे के पीछे भौतिकता बरकरार।
आज निर्धन निवाले को तरस रहे,
करते गुरु के पर्दे में बाबा व्यापार।
अब किसपर करे भरोसा हम,
एक पर्दे के पीछे जाने कितने?
आज दुनियाँ में छिपे घिनौने कारबार।
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स्वरचित और मौलिक
सर्वधिकार सुरक्षित
कवयित्री-शशिलता पाण्डेय
बलिया (उत्तर प्रदेश)

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