शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2020

कवि बंशीधर शिवहरे जी द्वारा 'माँ' विषय पर रचना

साप्ताहिक प्रतियोगिता
नमन बदलाव मंच
दिनांक - २१-१०-२०२०

मेरी मांँ तू शेरा वाली , 
मेरी मांँ तू जोता वाली ।
तेरे दर पे आये जो मांँ ,
जाता नहीं है खाली ।।

एक छोटा सा तू मुझपे ,
उपकार मांँ ये कर दे ।
झोली है मेरी खाली ,
झोली को मेरी भर दे ।।

तेरे दर से मैं ना जाऊ ,
अब लौट कर के खाली ।
मेरी मांँ तू शेरा वाली _ _ _ _ _ _ _ _

 मुझे ज्ञान ही नहीं है ,
मैं तो हूंँ मांँ अज्ञानी ।
कैसे बढू में आगे ,
मेरी सोच भी पुरानी ।।
मैंने अपने मन के मंदिर ,
में मूर्ति बिढाली ।
मेरी मांँ तू शेरावाली _ _ _ _ _ _ _

मझधार में है नैया ,
उसे पार मांँ लगा दे ।
मेरे सोय भाग को मांँ ,
एक बार तू  जाग दे ।।
मैं तो भटक रहा हूंँ ,
बनकर के मांँ मावली ।।

बंशीधर शिवहरे
सिवनी (म.प्र)

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