मंगलवार, 20 अक्तूबर 2020

कवयित्री साधना मिश्रा विंध्य जी द्वारा 'नारी' विषय पर रचना

बदलाव मंच को सादर नमन 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु सादर प्रस्तुत 


दिनांक- 1910 2020
दिन -सोमवार
विषय- नारी

वर्तमान समय में नारियां घर और बाहर समान रूप से अपनी जिम्मेदारियों को वहन कर रही हैं। बड़ा ही हर्ष होता है, जब महिला डॉक्टर, महिला इंजीनियर महिला समाज सेविका और महिला मुख्यमंत्री ,प्रधानमंत्री के रूप में देखती हूं, संसद सदस्यों के रूप में महिलाओं को देखती हूं बड़ा ही हर्ष होता है।

 परंतु जब उन्हीं महिलाओं के परिवार की तरफ देखती हूं तब एक बात जो दिल में पीड़ा उत्पन्न  करती है, वह आप सभी के मध्य साझा करना चाहूंगी।
 यदि हमारी बेटी कोई भी छोटी या बड़ी नौकरी के लिए घर से बाहर जाती है उसके घर पर वापस आने पर मां  बेटी के लिए चाय नाश्ता पानी सब का प्रबंध करती है, और बेटी दिन कैसा रहा, जानने के लिए उसके पास घड़ी दो घड़ी बैठ जाती है, चाहे ही घर में जितनी व्यस्तता हो जितना भी काम हो, सब कुछ किनारे करके बेटी के पास घड़ी दो घड़ी बैठ जाती है ,और बेटी को चाय नाश्ता कराती है और बेटी के आने पर ही चाय नाश्ता साथ में होता है , अब यही दूसरा दृश्य वही बेटी जब बहू बनकर दूसरे घर में प्रवेश कर चुकी है वही काम करके  घर लौटती है तब क्या होता है?  मांँ तो होती है बेटी की नहीं अब बहू की मां होती है सासू मांँ!
 सासू मां बहु को बेटी की तरह चाय या पानी देने में या उससे हाल खबर लेने में  बहुत कतराती है। उसके पास 2 मिनट प्यार से बैठने में क्यों हिचकिचाती  हैं यदि हम सभी स्त्रियां  संकल्प लें कि भविष्य में हम बहुओं को अपने घर लाएंगे तो हम उन्हें सिर्फ बेटी जैसी कहेंगे नहीं हम उन्हें बेटी स्वीकार करेंगे यह बहुए हम सभी को गौरवपूर्ण अनुभूति कराने के लिए इतना संघर्ष कर रही हैं तो हम जो घर के बड़े हैं मां के रूप में घर में है तो हमें सब के साथ मांँ जैसा ही पेश आना चाहिए फिर चाहे वह बहू हो चाहे बेटी ।
यदि मेरा संदेश 10   घरों में भी पहुंचेगा और हम सब थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन  करेंगे तो हम अपनी बहू को एक अच्छी मानसिकता देंगे और वही बहुएं जो कल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अच्छी मानसिकता तैयार करेंगी। हम बदलेंगे जग बदलेगा। यही अपील करती हूं कि जैसे हम बेटियों के दुख दर्द तकलीफ में साथ खड़े होते हैं वैसे ही बहुओं के दुख तकलीफ और उनके आराम की चिंता करें उनके मनोभावों को समझें और जहां तक हो सके उन्हें प्यार और स्नेह की अटूट डोर से बांध लें।

धन्यवाद

साधना मिश्रा विंध्य, लखनऊ उत्तर प्रदेश

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