बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

कवयित्री गीता पाण्डेय जी द्वारा रचना “आखिर कब तक”

।।  आखिर कब तक  ।।

न  मेरी  कविता  मरी  न  ये जिज्ञासा मरी ।
दुःख इस बात का है कि फिर मनीषा मरी ।

इमारत ढही तो दिखी हजारों गाड़ियां ।
आज कहाँ गयी कि रहती थी जो बाड़ियाँ ।।

कितने लोग पहुँचे है घर  वो भी थी बेटी ।
कोई देखने  नही आया असहाय लेटी ।।

अरे कबतक बेटियाँ ही बलि पे चढ़ेंगी ।
कैसे  इस घृणित समाज मे वो बढ़ेंगी ।।

आज लेखनी भी चलती हुई है शर्मिंदा ।
कुछ नही कर पा रही फिर भी है जिंदा ।।

जाग नारी शक्ति ले चंडी का अवतार ।
आज फिर तेज कर कृपाण की धार ।।

कुकर्म ने कैसी दिखलाई निर्दयता ।
नियति नही कर पाई उनसे क्रूरता ।।

रामराज्य लाने वाले कब तक दे अन्याय ।
दुष्कर्मी को मृत्युदंड नही हैं क्या सर्वमान्य  ।।

बॉलीवुड दलाल मीडिया भी दिखलाती है ।
गरीब बेटियों की चीख तो दब जाती है ।।

सारे  मुद्दों  को  वो  खूब  ही चिल्लाती है ।
पर उस बेटी की कराह नही सुन पाती है ।।

अरे पापियों तेरे बहन बेटियाँ नही होती ।
दुष्कर्म से तेरी रूह नफरत के बीज बोतीं ।।

हैवानी से फिर हुआ प्रदेश कलंकित ।
सबकी बहन बेटियाँ हो रही सशंकित ।।

जुल्म करने वालों  का मर गया जमीर ।
न्याय व्यवस्था से मन हो गया अधीर  ।।

कैसे बेटी को उस हाल में भी जबरन जलाया ।
माँ बाप को  उसके  अन्तिम दर्शन से तरसाया ।।

आखिर कब तक ये अत्याचार बढ़ेगा ।
इस पर भी क्या कभी सदाचार चढ़ेगा ।।

गीता की आंखे नम है देते हुए श्रद्धांजलि ।
निस्तब्ध है आज उसकी भी काव्यांजलि ।।

गीता पाण्डेय 
उपप्रधानाचार्या 
रायबरेली उ०प्र०

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