मंगलवार, 29 सितंबर 2020

कवि ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम जी द्वारा रचना (विषय-महात्मा गांधी का हिंन्दी के प्रति अनुराग)

विधा-निबंध
विषय:-*महात्मा गांधी का हिंन्दी के प्रति अनुराग

 महात्मा गांधी को भारत में कौन नहीं जानता? भारत ही क्या पूरे विश्व पटल पर महात्मा गांधी एक जाना हुआ नाम है। हमारे देश में महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा जाता है। महात्मा गांधी सत्य, अहिंसा के पुजारी थे और उनके जन्मदिवस को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाया जाता है। भारत की स्वतंत्रा में महात्मा गांधी का बहुत बड़ा योगदान था। महात्मा गांधी एक वह स्तंभ थे जो देखने में तो बहुत ही दुबले और कमजोर लगते थे परंतु वास्तव में स्वतंत्रता की रीढ़ की हड्डी साबित हुए। महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर अट्ठारह सौ उनहत्तर को पोरबंदर गुजरात में हुआ था। इनकी आरंभिक शिक्षा गुजरात में ही हुई। इसके पश्चात यह बैरिस्टर की पढ़ाई करने विदेश चले गए। इन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की और सेवा प्रारंभ की तभी इनके मस्तिष्क में भारत की स्वतंत्रता का बीज अंकुरित हो गया और यह बैटरी छोड़कर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में संलग्न हो गए।
 *हिंदी साहित्य के प्रति लगाव*
 महात्मा गांधी को हिंदी भाषा बहुत ही प्रिय थी। उनका मानना था कि जिस प्रकार से हम अपनी माता का सम्मान करते हैं उसी प्रकार से हमें अपनी मातृभाषा का भी सम्मान करना चाहिए ।
 सन 1921 में यंग इंडिया  पत्रिका में प्रकाशित अपने एक लेख  मैं गांधी जी ने स्पष्ट किया है कि हिंदी के प्रति  मेरा राष्ट्रीय एवं भावात्मक लगाव है।
 और  स्वतंत्रता आंदोलन की सभी गतिविधियों के लिए सभी कार्यकर्ताओं को हिंदी सीखना अनिवार्य होगा। हमारी समस्त कार्यवाहियां एवं विचार विमर्श हिंदी में ही होगा। गांधी जी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित प्रसारित करने का पूर्ण प्रयास किया एवं  हिंदी को राष्ट्रीय एकता अखंडता एवं स्वतंत्रता की आधारशिला भी कहा।
 उन्होंने बताया कि एक  ह्रदय दूसरे  हृदय से एक विशेष भाषा में बात करता है जिससे भावनाओं का आदान-प्रदान होता है और समस्त भारतीयों के लिए वह हृदय की भाषा हिंदी ही है। उनका मानना था कि बिना राष्ट्रभाषा के कोई भी देश गूंगा हो जाता है। अतः प्रत्येक देश को अपनी राष्ट्रभाषा का प्रचार प्रसार विधिवत करना चाहिए। भारत हमारा देश है और यहां की मुख्य भाषा हिंदी ही है। अतः हम सभी को हिंदी में ही सारे क्रियाकलाप करनी चाहिए। हिंदी के प्रचार प्रसार में तन मन धन से झुकना चाहिए क्योंकि यह हिंदी है तभी हमारा गौरव है और यदि नहीं तो हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। एक बार एक पत्रकार ने स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी से अपने विचारों को अंग्रेजी में प्रस्तुत करने का निवेदन किया जिससे कि सभी देशों में गांधी जी के विचारों का प्रसारण हो सके परंतु गांधी जी ने कहां की मैं अंग्रेजी में अपने विचार प्रस्तुत नहीं करूंगा यदि दुनिया को लगता है कि गांधी जी को अंग्रेजी नहीं आती तो लगता रहे परंतु मैं हिंदी में ही अपने विचार प्रस्तुत करूंगा।मैं हिंदी के सम्मान को ठेस नहीं लगने दूंगा। इस प्रकार से हम देखते हैं कि गांधीजी हिंदी भाषा के उत्थान एवं प्रचार प्रसार के लिए बहुत  प्रयासरत रहे और हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए अपना पूर्ण प्रयास किया।
ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम कानपुर नगर

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