गुरुवार, 24 सितंबर 2020

कवयित्री साधना मिश्रा विंध्य जी द्वारा रचना (विषय- रात बढ़ने लगी)

🙏 पावन मंच को नमन 🙏

विधा- गीत
विषय -  *रात बढ़ने लगी*

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रात बढ़ने लगी जिंदगी की मेरी
रौशनीं से दूर वह जाती रही,
बड़ी दूर तक साथ आती रही 
 मेरी मैय्यत पर आंसू बहाती रही।

रात बढ़ने लगी जिंदगी की मेरी
रौशनी से वह दूर जाती रही,
हाय !दिल ने मेरे तुझे धोखा दिया वक्त से पहले ही वह रुक गया।

बड़ी दूर तक साथ आती रही 
मेरी मैय्यत पर आंसू बहाती रही,
काश! दिल मेरा न तेरे पास होता
न तेरा मुझसे यूं बिछोह होता।

बड़ी दूर तक साथ आती रही
मेरी मैय्यत पर आंसू बहाती रही,
सोचती बीते लम्हों में खोती गई
बाद मेरे यादों में ढलती गई।
बड़ी दूर तक साथ आती रही
मेरी मैय्यत पर आंसू बहाती रही,
दूर करके सिंदूर बिंदिया को वो
जार -जार सिमट तड़पने लगी।

रात बढ़ने लगी जिंदगी की मेरी
रौशनी से वह दूर जाती रही,
बड़ी दूर तक साथ आते रही
मेरी मैय्यत पर आंसू बहाती रही।


साधना मिश्रा विंध्य
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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