सोमवार, 28 सितंबर 2020

कवि डॉ.जयप्रकाश नागला जी द्वारा रचना

अब कोरोना के साये 
में ही लोग जीने और 
मरने लगे है ,
ऊपर से मुस्कुराहट तो है 
लेकिन 
ये साये 
भीतर ही भीतर 
डराने लगे है । 
डर तो डर होता है 
वही ज्यादा डरता है जो 
अपने आप को निडर कहता है ।
पहले चिंतन क्षितिज के 
पार तक हुआ करता 
था , अब उसकी 
जगह चिन्ता व्याप्त है , 
आप जान पाते है 
इन दिनों कि 
कौन कितना मुस्कुराता है ?
मास्क के भीतर 
हर कोई अपना गम 
छिपाता है !
अब हर बस्ती में 
एक उदासी है , 
सच कहता हूं , जिंदगी
वक्त कि दासी 
है !! 
वक्त मुस्कुराएगा तब 
सब मुस्कुरायेंगे , 
हौसला रखिये 
सब मिलकर 
एक दिन कोरोना
को हराएंगे , 
फिर जिंदगी 
मुस्कुराएगी इस 
मास्क से बाहर आकर ।

डॉ . जयप्रकाश नागला 
नान्देड़

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