गुरुवार, 24 सितंबर 2020

कवयित्री गरिमा विनीत भाटिया जी द्वारा "आँखों के किनारे ठहरा एक आँसू" रचना*

*नमन-बदलाव मंच* 
 *शीर्षक- आँखो के किनारे  ठहरा एक आँसू* 


    "आँखो के किनारे  ठहरा एक आंँसू"
    मोती सा चमका यूं ओझल सा हो गया 
    बरस बरस मन में ही बादल सा हो गया 
    ख्बाहिशों की उडा़न लिए उड़ना चाहा 
    पर शोषित हुयी थी वो लाचार ,तेजाब से 
    गिरा दिया गया जब जब बढ़ना चाहा 
    कुछ सपने मिट्टी में मिले और दफन हुए 
    जीने के हौसलेे सो गए और कफन हुए 
   '' आँखों के किनारे  ठहरा एक आंँसू"
    मोती सा चमका यूं ओझल सा हो गया 
    बरस बरस मन में ही बादल सा हो गया।

        *गरिमा विनित भाटिया* 
        *अमरावती, महाराष्ट्र*

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