शनिवार, 5 सितंबर 2020

डॉ० लता जी,द्वारा रचित शिक्षक और छात्र के प्रेम से परिपूर्ण एक पवित्र रिस्ते की कथा...

दिनांक: 05.08.2020
दिवस: शनिवार
प्रकार: स्व:रचित एवं मौलिक
विधा: कहानी
प्रेषिका: डॉ. लता (हिंदी शिक्षिका), नई दिल्ली
शीर्षक: 'अध्यापिका बनी माँ'

कई दिन बीत गए थे, आदित्य विद्यालय नहीं जा रहा था। सभी परेशान थे। घर में माँ पूछती तो भी नहीं बताता। एक दिन उसकी अध्यापिका का फोन आया की यदि आदित्य विद्यालय नहीं आएगा तो नाम काट दिया जाएगा। घबराकर आदित्य के माता-पिता कक्षा अध्यापिका से बात करने के लिए उसे लेकर विद्यालय पहुचे। विद्यालय जाकर पूछताछ की तो प्रधानाचार्या मैम ने खूब डाँटा। अभिभावकों के तो आँसू नई निकल गए। ख़ैर वे कक्षा अध्यापिका को ढूँढने लगे। बहुत देर में वह मिली, तो आदित्य को देख कर नाराज़ हुई। मगर दोनों अभिभावकों की हालत देख समझ गई कि प्रधानाचार्या ने उन्हें खूब डाँटा होगा। समझदारी से काम लेते हुए वह उसे अकेले में ले गई और पूछा क्या बात है बेटा आप विद्यालय क्यों नहीं आते? आदित्य थोड़े संकुचित स्वर में बोला, ''मैम मेरे माता-पिता के पास पढ़ाई के लिए पैसे नही हैं। मुझसे उनकी हालत नहीं देखी जाती। वह चाहते हैं मैं पढूँ, मगर मैं उन पर बोझ नहीं डालना चाहता। आप बताए कैसे करूँ।'' आदित्य की सारी बात सुनकर, वह उसे वापिस अभिभावकों के पास गईं और बोली, 'आज से आदित्य की फीस माफ़ है। आप इसे विद्यालय भेजें। सरकार ने उन बच्चों की फीस माफ़ कर दी है जो विद्यालय छोड़ने जा रहे थे।' इस बात को सुनकर सभी बहुत प्रसन्न हुए। आदित्य भी अब रोज़ विद्यालय आता। एक दिन उसने देखा कि उसकी अध्यापिका फीस काउंटर के बाहर फीस जमा कर रही है। फीस की रसीद बैग में रखते हुए आगे बढ़ी तो वह बैग में न रखी गई और जाते-जाते रसीद नीचे गिर गई। आदित्य दौड़ के गया और रसीद उठा कर आवाज़ लगाने ही वाला था तो देखा, नाम आदित्य कक्षा दसवीं। उसे सारी बात समझ आ गई कि उसकी कक्षा अध्यापिका पूरे एक वर्ष से अपने पास से उसकी फीस जमा करती आ रही है। आदित्य के मन में उस दिन अपनी अध्यापिका और सम्पूर्ण शिक्षक-वर्ग के लिए इज्ज़त और बढ़ गई। अगले दिन शिक्षक-दिवस था। आदित्य ने एक ख़ूबसूरत कविता लिखी और उसे फ्रेम करवाकर अपनी कक्षा अध्यापिका को दी। दोनों ने कभी एक-दूजे को नहीं बताया कि दोनों सारा राज़ जानते हैं। ऐसे ही करते हुए आदित्य बारहवीं पास कर गया। कुछ वर्षों बाद वह विद्यालय आया और अपनी पुरानी अध्यापिका को ढूँढने लगा। मिलते ही उसने नमस्कार किया और अपनी जेब से एक चेक निकाल कर बोला, मैम यह मेरी पहली कमाई का चेक है। चेक पर राशि पचास हजार लिखी थी। देख कर अध्यापिका बहुत खुश हुई, बोली, 'जाकर अपनी माता जी को देना।' आदित्य में कहा , मैम यह आपके लिए है। अचंभित होकर अध्यापिका बोली, 'यह क्यों, ऐसा नहीं होता बेटा।' तब आदित्य बोला, 'मैम इस दुनिया में कोई किसी की फीस भी तो नहीं भरता। मगर आपने भरी तो क्या मैं आपको माता की दर्ज़ा नहीं दे सकता।' अध्यापिका सुनकर हैरान रह गई और बोली तुम सब जान गए। आदित्य बोला, 'मैं तो बहुत वर्षों पहले ही जान गया था मगर हिम्मत और हालात नहीं थे कि आपको कुछ बोलूँ। आप यह चेक एहसान उतारने के लिए नहीं समझे। बस यब समझे कि यह मेरी पहली कमाई मैं अपनी दूसरी जननी माँ को दे रहा हूँ।' आदित्य की बात सुनकर, अध्यापिका बोली , 'यदि मुझे जननी माँ मान ही लिया है तो जो मैंने किया उसे मेरा फ़र्ज समझो। अब जाओ, तुम्हारी माँ को जाकर यह दो।' बहुत बहस कर बाद भी अध्यापिका ने वह चेक नही लिया। आदित्य को उस दिन एक एहसास और हुआ कि अध्यापक हमें नि:स्वार्थ पढ़ाते हैं और इसी एहसास के साथ उसके आँसू निकल गए और वह अध्यापिका के पैरों में गिर गया। आदित्य प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस पर ही नहीं, बल्कि हर त्योहार पर अपनी अध्यापिका को याद करते हुए मैसेज भेजता और अक़्सर उनसे मिलने जाता।
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