शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

डाॅ०विजय लक्ष्मी जी काठगोदाम, उत्तराखण्ड के द्वारा#

*"बदलाव मंच को नमन"
अन्तर्राष्ट्रीय साप्ताहिक 'लिखित' प्रतियोगिता हेतु गद्य लेख

विषय-"लॉकडाउन में शिक्षकों की स्थिति"* 

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, साँस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है, और इस जिम्मेदारी को एक शिक्षक पूरी निष्ठा और लगन के साथ निभाता भी है। शिक्षक ही राष्ट्र का निर्माता होता है। वह शिक्षक ही होता है जो अपने छात्रों का मार्गदर्शन करता है और उसके कौशल को विकसित करने में भी सहायता करता है। कितनी भी परेशानी क्यों न हो फिर भी अपने कार्यों का निर्वहन पूरी ईमानदारी के साथ करता है। फिर क्यों शिक्षकों के साथ भेदभाव होता है। शिक्षक तो शिक्षक ही होता है, चाहें वह किसी भी संस्था का हो। कोरोना काल में इस संकट की घड़ी में बीते कुछ समय से लॉकडाउन की स्थिति में शिक्षकों पर सबसे अधिक मानसिक प्रभाव पड़ा है। हमारे शिक्षकों के लिए आजीविका तक की समस्या पैदा हो गई है। लेकिन फिर भी इस संकट के समय में भी ऑनलाइन कक्षाओं की भरमार, अन्य दूसरे कार्य सरकार उनसे करवा रही है और वेतन भी न के बराबर। कहीं-कहीं तो प्राइवेट संस्थानों ने शिक्षकों को शिक्षणकार्य से ही मुक्त कर दिया है। विभिन्न संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ इतना भेदभाव और पक्षपात क्यों? जबकि कहीं-कहीं तो लॉकडाउन के समय में भी इन शिक्षकों ने अपना कार्य, अपनी कक्षाओं को लेने का कार्य पूरी लगन और निष्ठा के साथ किया है। लॉकडाउन की दयनीय स्थिति में भी शिक्षक ऑनलाइन  कक्षाओं में भी छात्रों के साथ जुड़े रहे और उनका मार्गदर्शन भी किया। फिर भी दो-तीन महीने उनको सेलरी नहीं मिली। लॉकडाउन की स्थिति में प्रवासी मजदूरों के साथ-साथ इन शिक्षकों ने भी बहुत कठिनाईयों और समस्याओं का सामना किया है। जब एक शिक्षक अपना कर्त्तव्य निभाने में यह नहीं देखता कि उसको वेतन मिल रहा है या नहीं, या कम वेतन दिया जा रहा है, तो कम से कम इस लॉकडाउन की स्थिति में शिक्षकों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। अखबारों और पत्रिकाओं में आए दिन यही पढ़ने को मिला कि देश के निर्माता शिक्षक अब शिक्षणकार्य छोड़कर दूसरा रोज़गार कर रहे हैं या खेती- बागवानी का कार्य कर रहे हैं। उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। सरकार उनके साथ अनदेखा और अंजाना व्यवहार क्यों कर रही है। हमारे शिक्षक राष्ट्र के भविष्य के निर्माता होते हैं और अपने छात्रों का मार्गदर्शन करने के साथ-साथ वह उनको सफलता की ऊँचाईयों तक ले जाते हैं। अपनी विभिन्न पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं को नज़रअंदाज़ करते हुए भी वह अपने कर्मपथ पर सदैव अग्रसर रहता है। इस प्रकार इस संकट के दाैर में भी हमारे शिक्षकों ने केवल धैर्य और संयम दिखलाकर प्रकट किया है कि किसी भी परिस्थिति में वे हार मानने वाले नहीं हैं। 

(मौलिक लेख)
डाॅ०विजय लक्ष्मी
काठगोदाम, उत्तराखण्ड

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