बुधवार, 2 सितंबर 2020

कवयित्री रोशनी दीक्षित 'रित्री' जी द्वारा 'आज़ाद देश' विषय रचना🖊️🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

*दिनांक15/08/2020
सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 
**हम आजाद हुए*
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मेरे देश तुझे आज़ाद हुए,
कहने को 73 साल हुए हैं। 
पर आज भी कितनी जंजीरों में, 
हम भारतवासी जकड़े बैठे हैं।
मन में आता एक ही प्रश्न -
*क्या सचमुच, क्या सचमुच हम आज़ाद हुए?*

आज भी हमारे देश में -हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसााईं रहते हैं। 
फिर किस जुबान से खुद को हम, हिन्दुस्तानी कहते हैं। 
धर्म-जाति के जाल में उलझे।
*क्या सचमुच, क्या सचमुच हम आज़ाद हुए?*

आज हमारी राष्ट्रभाषा second language कहलाती। 
अफसोस हर हिन्दुस्तानी को, 
हिन्दुस्तान की भाषा नहीं आती। 
चौंड़ी छाती करते हैं जब भी, अंग्रेजी में बात करें। 
*क्या सचमुच, क्या सचमुच हम आज़ाद हुए?*

बच्चे और मातपिता भगवान यहाँ है कहलाते।
पत्थर की मूरत को पूजें और भगवान आश्रम में छोड़ आते।
शाखाएँ ही दीमक बनकर, 
जड़ों को देखो खोखला करें। 
*क्या सचमुच, क्या सचमुच हम आज़ाद हुए?*

खून-पसीना बहा करके, खेत में सोना लहराए।
भारतमाता की लाज बचाने, 
वीरों ने सिर हैं कटवाए।
फिर भी "जय जवान, जय किसान "साल में बस दो बार कहें। 
*क्या सचमुच, क्या सचमुच हम आज़ाद हुए?*

माँ, बहन, बेटी यहाँ ,देवी की उपमा हैं पातीं। 
देश पर संकट आए तो, मर्दानी लक्ष्मी भी बन जातीं। 
फिर कौन से दरिंदे हैं जो, 
इनका यहाँ शिकार करें। 
*क्या सचमुच, क्या सचमुच हम आज़ाद हुए?*

अब तो जागो भारतवासियों,
देश प्रेम की कुछ बात करो।  
कहने बस से कुछ नहीं  होता, 
दिल में सच्चा देशप्रेम का भाव भरो।
क्या हरा,क्या नारंगी, 
दोनों बिन तिरंगा भी अधूरा है। एक ही माँ के बच्चे हैं सब, 
फिर मनमें क्यों कोई बेर रखें। 
*क्या सचमुच, क्या सचमुच हम आज़ाद हुए?*

जब कोई न तरसे दानों को और लगजाएँ ताले आश्रमों में। 
बहन, बेटी सिर उठाकर चलें 
जिस दिन सूनी सड़कों में। 
लक्ष्मी और आज़ाद मिलें जब,
शहर-शहर और गाँवों में।
*हाँ उस दिन, हाँ उस दिन कहना फक्र से तुम-"देखो अब हम आज़ाद हुए।*

रोशनी दीक्षित 'रित्री"बिलासपुर छत्तीसगढ़.. 🖊️🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

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