सोमवार, 21 सितंबर 2020

कवयित्री डॉ. रेखा मंडलोई जी द्वारा समसामयिक विषय पर लघुकथा

वैश्विक महामारी के दौर में कोरोना  हारेगा और भारत जीतेगा इस भाव को मन में संजोए अमेरिका में रह रहे  भारतीय , और विशेष रूप से युवा पीढ़ी के मन के भाव जो उन्होंने अपनी मां के लिए मन में समाहित कर रखे होंगे। उसी कल्पना को यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। शायद आप सब को पसंद आएगी इसी उम्मीद के साथ .. ....  .. 
                         याद 
मां की याद बहुत सताती यहां मां नहीं मिलती है हमें,
काम कर थकने पर खाखरा- चाय याद आती है हमें।
रोटी तेरे हाथ की ना मिलती उसकी याद सताती है हमें,
तेरे बनाएं पराठो से ही मिलती है जीवन ज्योति हमें।
मां तेरी मुस्कराहट की चाहत हमेशा बनी रहती है हमें,
खुश रहने की कोशिश की पर भी ना मिली खुशियां हमें।
काम की चाहत में दूर आए, पर नाम की भी है चाहत हमें,
सपनों में तुझे बसा खुशियां तलाशने की चाहत है हमें।
मां के प्यार को तरसते आंचल की छांव न मिलती है हमें,
मां तू बहुत भोली, प्यारी व मासूम सी ही तो लगती  है हमें।
तेरे जीवन में दुःख ना आए इसी भाव में खुशी मिलती है हमें,
तुझसे मिलने की बेताबी भी अब तो बहुत सताती है हमें। 
कोरोना काल की समाप्ति पर ही मां मिल सकती है हमें,
इसी उम्मीद को बनाए रखने से ही तो ताकत मिलती है हमें।
तू जगती  इंतजार में रातों को यहां न मिलती शांति है  हमें,
बस दुआ है प्रभु से तू जल्दी मिल जाए तेरी याद आती है हमें।


                   डॉ. रेखा मंडलोई

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