गुरुवार, 17 सितंबर 2020

कलम कहते रहे#द्वारा - सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"जी उम्दा रचना#

कलम कहते रहे... 
हर  अल्फाज़  उनसे  हम कहते रहे
यों जज़्बात निगाह से हम कहते रहे

बखुदा^हमने उन्हें क्या समझा (खुदा-कसम)
वो  तो  हमको  ही सनम कहते  रहे

कहीं हो ना जाते वो ज़्यादा बरहम^(क्रोधित)
उनसे हम हाले-दिल कम कहते रहे

कितनी अजीब अपनी शब गुजरी है
रातभर किस्सा - ए - ग़म कहते रहे

उनके लबों को मय  कहा  तो क्या
जामे-ज़ेहराब^ को चश्म^ कहते रहे 
(विषपात्र, जल )

सफा-ए-चर्ख ^ जब सिहा किया तो (नभ से पन्ने )
हम अपनी आह को कलम कहते रहे

तमाम उम्र निर्दोष बने रहे "उड़ता"
और उनपर इल्जाम हम कहते रहे.



स्वरचित मौलिक रचना 


द्वारा - सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"
झज्जर - 124103 (हरियाणा )
संपर्क  91-9466865227
udtasonu2003@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें