बुधवार, 9 सितंबर 2020

कवि व लेखक आ.रमेश चन्द्र भाट जी द्वारा 'समय चक्र' विषय पर रचना

बदलाव साहित्य मंच (राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय) साप्ताहिक प्रतियोगिता, सितंबर'2020

दिनांक--04-09-2020

विषय:- लाक डाउन में शिक्षक की स्थिति

शीर्षक- समय का चक्र
🌻🌻 🌻🌻 🌻🌻
स्वरचित रचना
* * * * * * * * * * * * *
संतोषी एक छोटे से कस्बे के प्राइवेट स्कूल में शिक्षक है। परिवार की जरूरत पूरी करने के लिए घर आकर ट्यूशन भी पढाता है। थोड़ी दूरी पर रिक्शा वाला राजकुमार रहता है| उसकी पत्नी रानी बड़े घरों में काम करती है। गरीब रिक्शे वाले की बेटी परि को साक्षर करने के लिए संतोषी बिना फीस लिए पढ़ाता है ओर कभी-कभी भूकी परि को खाना भी खिलाता। जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव को झेलते हुए दौनो परिवार हंसी मे सारे कष्ट भुलाकर संतोष पूर्वक जीवन की गाड़ी धकेल रहे थे|
   अचानक पूरा संसार  खतरनाक वायरस कोरोना की चपेट में आ जाता है ओर सब कुछ लॉक डाउन हो जाता है| रिक्शा, बाई का काम, ट्युशन, स्कुल, सब बंद हुआ ओर सब अपने-अपने घरों में कैद हो गए। 
      सरकार ओर समाजसेवी संस्थाएँ राहत सामग्री बांट कर गरीबों की हर संभव मदद का प्रयास कर रही थी। राहत सामग्री बांटने वाले आते ओर मोहल्ले में गरीब कौन है यह पूछकर रिक्शेवाले के घर राहत सामग्री पकड़ा जाते। इस प्रकार उसके पास काफी दिनों का राशन जमा हो गया। लेकिन मध्यम वर्गीय अध्यापक की सुध किसी ने नहीं ली। अध्यापक का आत्मसम्मान भी उसे किसी के सामने हाथ फैलाने से रोक देता।
     संतोषी की पत्नी के थोड़े से गहने कुछ दिन पेट भरने के काम आ गये। जब फाकाकशी की नौबत आ गई तो आखिरकार भारी मन से पत्नी का मंगल सूत्र गिरवी रख संतोषी सब्जी बेचने का काम करता है। मुहँ पर बड़ा सा गमछा मुहँ छुपाने का काम करता है, वो लोगों से आंख भी नहीं मिला पा रहा था। बड़ी मुश्किल से कुछ सब्जियां बिकी। यहाँ पर कैसे बैठा है बे ऐसा धमकाकर एक हवलदार सौ रुपये ऐंठ कर ले गया। अनुभवहीन संतोषी ज्यादा सब्जी नहीं बेच पाया ओर बची सब्जियां समेटकर घर आ गया। परिवार सब्जी मे बचे आलू उबालकर पेट भरता है।
    लाक डाउन में थोड़ी छूट मिलने पर एक दिन परि संतोषी के घर अपनी सहेली के पास खेलने आती है ओर भूख लगने पर खाना मांगने पर पता चलता है कि आज घर में खाने को कुछ नहीं है। परि अपनी माँ से यह बात बताती है। जो परिवार उसकी बेटी को निशुल्क पढाता था, खाना भी खिलाता था आज भूका बैठा है तो रिक्शे वाले का परिवार बहुत दुखी होता है। जमा राहत सामग्री का आधा हिस्सा वो रिक्शे में भरता है ओर रानी से कुछ खाना बनवाकर सपरिवार संतोषी के घर आता है ओर हाथ जोड़ कर राहत सामग्री स्वीकारने का आग्रह करता है।
     समय का चक्र बड़ा ही क्रूर होता है। देने वाला लेने वाला व लेने वाला देने वाला बन जाता है। परि अपनी सहेली के साथ खाना खा रही है। दोनो परिवार की आँखों में आंसू है लेकिन मानवता मुस्कुरा रही है।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
नाम-रमेश चंद्र भाट
पता-टाईप-4/61-सी,
रावतभाटा, चितौड़गढ़,
राजस्थान।
मो.9413356728

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें