रविवार, 9 अगस्त 2020

बुढ़ापा

बदलाव मंच
8/8/2020

स्वरचित रचना।
कविता - बुढ़ापा 



जिंदगी भर कहाँ सोचा था
 कि ये दिन भी आना है।
सुंदरता फुर्ती के जगह झुर्री 
भरा चेहरा व ,बेबस हो जाना है।।

जहाँ दौड़ कर कर लेता था
 पल में सारे अपने काम।।
क्या पता था मुझपर भी लग जायेगा 
असमर्थता व बन्धिसों का विराम।।

जिन बच्चों को पाल कर बड़ा किया।
उँगली पकड़ कर अपने समक्ष खड़ा किया।।
आज वहीँ अपनी मर्जी चलाते है।
मुझकों एक वस्तु समझकर
 घर के किसी कोने में छोड़ आते है।।

पड़ा रहता हूँ अपने खाट पर 
जिंदगी के बीते पल को सोचते।
मेरे बीते सुनहरा पल मुझकों है कचोटते।।

कुछ तो साथ देते है और तो
 जी भरकर ताना देते है।।
जो कहते थे पापा है जान हमारे 
वही एक काम करने से मना करते है।।

कमर का लेकर पत्नी 
 बैठे दर्द से कराहती है। 
मेरा हाथ पकड़ कर ढ़ेर 
सारी ढाढस बंधाती है।। 

सारे दर्द भूल जाता हूँ जब 
धीरे से देख नयनों में बात होती है।
अब इस उम्र कहाँ शिमला मनाली।
अबतो एकदूसरे से आमने सामने
 चारपाई पर मुलाकात होती है।।

मन करता है तो एक कमरे से 
दूसरे कमरे में बेंत पकड़े 
काँपते हुए चला जाता हूँ।
अबतो इतने भर में
 मानों मैं हॉप जाता हूँ।।

ख़ुदसे नही खा पाता हूँ,
 नही स्वयं चल पाता हूँ।
जिंदगी में जी लिया जी
 भरकर किन्तु फिर भी 
इस पड़ाव पर केवल
 बच्चों संग प्यार चाहता हूँ।।

पीछे देखता हूँ कितना 
बेखबर था इस बुढ़ापे से।
जब माँ बोलती थी बाहर हो 
जाता था मैं खुदके आपे से।।

अभी कुछ दिन हुए पत्नी भी नही रही।
कुछ राज बयाँ करी कुछ बिन कहे गई।।
अब तो जीवन में केवल तन्हाई है।
जिंदगी में कुछ नही रहा केवल
 अपनो के होते भी रुसवाई है।।

शायद बच्चों को भी नही पता
 बुढ़ापा क्या है इसका पता 
बुढ़ापे आने पर ही चलता पता है।।
 
भाई मेरे सदा एक बात ध्यान रखना।
माता पिता को बुढ़ापे में
 उनका सदा सम्मान करना।
उनको और कुछ नही चाहिये पैसे 
धन से पहले पहले तुम्हारा प्रेम, स्नेह चाहिए।।
प्रकाश कुमार
मधुबनी, बिहार
9560205841 

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