शनिवार, 29 अगस्त 2020

व्यंग #प्रकाश कुमार मधुबनी के द्वारा शानदार रचना#

बदलाव मंच 

29/8/2020

स्वरचित रचना

व्यंग करते होठ 

ये क्या हुआ है होठो को तुम्हारे।
जो देखते बनती है गजब नजारे।।
ये मौन है किंतु बहुत कुछ कहते
हँसते या वास्तव में व्यंग सुना रहे।।

बहुत देखी है वैसे तो रंगीन दुनिया।
 मस्ती में चूर करते यू अटखेलियां।।
किन्तु देखा ना तुमसा हुस्नेमलिका।
ऐसा तो नही ये कोई राज बता रहे।।

ऊपर से तुम्हारी जुल्फों की घटा।
जैसे धूप को छुपादे बादल की छटा।।
कोई बात तो है प्रिय आपकी अदा में।
 अन्यथा क्यों ये मुझे उलझा रहे।।

ऐसे ही तुम सदा मुस्कुराते रहो।
सबको सुखद एहसास कराते रहो।।
इनका भी जीवन में योगदान है बहुत।
 ये भी तो जीने का हौसला बढा रहे।।

ये मासुमियत के भी अपने मायने है।
जाकर देखों घर में यदि आइने है।।
नही रहने देते हमारे चेहरे पर रंजिश ए गम।
ये खाली थोड़ी ही बैठे है बड़ी भूमिका निभा रहे।।

प्रकाश कुमार
मधुबनी, बिहार

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