सोमवार, 3 अगस्त 2020

दे गए हमको आजादी ,कितने भारत मां के लाल ।उनकी बदौलत ही मनता है, स्वतंत्रता दिवस हर साल ।।

बदलाव मंच द्वारा आयोजित काव्य मिश्रित प्रतियोगिता हेतु ।

वर्ष 2020 हम आजादी के 74वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं।हमारा भारतवर्ष सभ्यता का ,संस्कृति का ,त्योहारों का देश है। स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए किसी त्योहार से कम नहीं है। देश के सभी नागरिक हर्ष और उल्लास के साथ इस पर्व को मनाते हैं ,और सालभर इंतज़ार भी करते हैं,स्वतंत्रता दिवस का।

दे गए हमको आजादी ,कितने भारत मां के लाल ।उनकी बदौलत ही मनता है, स्वतंत्रता दिवस हर साल ।।

आज अगर हम खुली हवा में सांस लेते हैं,प्रजातंत्र का स्वाद चख पा रहे हैं, तो  अपने देश के वीर जवानों और आजादी दिलाने वाले सपूतों को कैसे भूल सकते हैं।जिन्होंने  अपने प्राणों की आहुति देकर हमें परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराया।चाहे वो झांसी की रानी हो,जहां से स्वतंत्रता की लड़ाई की नींव रखी गयी,या फिर भगत सिंह,सुखदेव, सुभाष चंद्र बोष,बापू,या नेहरू।

भारती के नाम पर,जीवन को दान कर
स्वतंत्रता दिलाई हमें,उनको प्रणाम है।

भगत गुरु सुखदेव,फांसी पर झूले थे
जान पर खेले सब,उनको प्रणाम है।

शतरंज आज़ादी की,खुद को लगाया दांव,
हार के भी जीत गए,उनको प्रणाम है।

झुके नहीं डरे नहीं,राह से वो हटे नहीं
क्रांति रूपी काल बने,उनको प्रणाम है।

लेकिन अब कहना ये  जरूरी हो जाता है कि क्या इन 74 वर्षों में हम सब आज़ाद हो पाए हैं ?क्या सचमुच हम विश्व के साथ आगे बढ़ रहे है?
जी बिल्कुल ,हम विज्ञान में ,तकनीक में ,सैन्य बल में किसी भी रूप में किसी भी देश से कम नहीं है ।

हर क्षेत्र में भारत ने अपना परचम लहराया है ।
पूरे विश्व को अपनी बुद्धिमत्ता का लोहा मनवाया है।

लेकिन चलिए बात करते हैं मानवीय गुणों की व्यवहारों की, आंतरिक व्यवस्था की सामाजिक व्यवस्था की मानव  मनोविज्ञान की तो शायद यहां जवाब नहीं हो जाएगा ।

वापस लौटते हैं अपने देश की व्यवस्था की ओर जब किसी गरीब की मौत हो जाती है भुख से,और गोदामों में अन्न सड़ रहा होता है।कोई औरत अपना जिस्म या फिर कभी कभी बच्चे को भी अपने  भूख खातिर बेच  डालती है ।किसान आत्महत्या करने पर विवश हो रहे हैं। और दूसरी ओर अरबों खरबों का घोटाला करने वाले सफेदपोश लोग देश के प्रतिष्ठित पदों पर आसीन हैं यह सही मायने में यह देश की आजादी की सच्ची तस्वीर को बयां करता है ।भारत माँ की आत्मा भी तड़प कर ये पंक्तियां कहती होंगी।

मेरे देश के लोगों  किस आजादी पर बोलो मैं अभिमान करूँ।
जब मेरा आँचल किसान के रक्त से लथपथ है।

सिर्फ परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ देने से हम खुद को आजाद घोषित नहीं कर सकते । हमें आजादी चाहिए राजनीतिक बखेड़ों से , धर्म के नाम पर हो रहे दंगों से,मंदिर मस्जिद के नाम पर होने वाले सांप्रदायिकता से ,जातिवाद से जहां आज भी ब्राह्मण खुद को भगवान मानते हैं और शूद्रों का मंदिर और प्रवेश वर्जित है ।आजादी चाहिए जातिवाद आरक्षण से ,आजादी चाहिए लगातार हो रहे बलात्कार की घटनाओं से ,लिंग भेद के नाम पर कोख में मर रही बच्चियों की हत्या  से ,अंधविश्वास  के नाम पर चढ़ने वाली बलि से, न्याय व्यवस्था से ,जहां बेगुनाह को सजा मिल जाती है, पैसे के दम पर हत्यारा खुले आम घूमता हो।देश ने आजादी तो पा ली है। लेकिन जरूरत है मानसिक आजादी की ।
        गांधी जी ,नेहरु जी,लाल बहादुर शास्त्री अंबेडकर के सपनों का भारत ऐसा तो नहीं था। सही मायने में आजादी तब होगी जब हम इन सामाजिक विकारों से, कुरीतियों से ,कुप्रथा से मानसिक रूप से आजादी प्राप्त कर लेंगे ।तब सही मायने में झंडोत्तोलन भी सार्थक होगा तिरंगा के तीन रंगों का उचित मायने तब सामने आएगा ।
जय हिंद जय भारत ।।

हम पा लेंगे आजादी एक दिन ।
इन कुप्रथा, कुविचारों से ।
भर देंगे भारत मां का आंचल ।
अपने उज्जवल संस्कारों से ।
तब सब मिलकर एक दिन ।
आजादी का जश्न मनाएंगे ।
असली स्वतंत्रता तब होगी ।
हम एक दिन ये त्यौहार मनाएंगे।

शोभा किरण
जमशेदपुर
झारखंड

Badlavmanch

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