रविवार, 30 अगस्त 2020

कवयित्री शशिलता पाण्डेय जी द्वारा 'मॉडर्न बंजारे' विषय पर रचना

🎂मॉडर्न बंजारे🎂

घूम-घूम कर दुनिया में,
    करते अपने वारे-न्यारे।
ऐसे  निट्ठल्ले लोग जो,
      दुनियाँ को देते धोखा,
इनका नही कोई ठौर-ठिकाना
       फ़िरते ये मारे-मारे।
अपना निभाते नहीं कर्तब्य,
             भरमाते सारे जग को,
   मूर्ख बनाते दुनियाँ को,
           अपना फर्ज भूल वो सारे।
बिना मेहनत माल उड़ाते,
      मुफ्त की भक्ति- सेवा पाते।
अंध-विश्वास का खोल,
      पहनते ये मॉडर्न बंजारे।
संत बने बैठे सिंघासन पर,
        ,सैर करें वायुयान से ।
हर-दिन शहर पे शहर बदलतें,
        लगते है भक्ति के नारे।
रंग-बिरंगे रूप बना  कर,
    भक्ति नाम पर  नृत्य बावरा,
झूठी इज्जत झूठी शोहरत,
      धर्म-नाम धन खूब बटोरे।
कर भविष्य-वाणी उल्टी-सीधी, 
     बनें है धरती के भगवान।
धर्म का धंधा सबसे उम्दा,
     करते अपनें मॉडर्न बंजारे।
जंगल साधना और तपस्या,
       मुनि-ऋषि हम भूलें सारे।
अपनीं तो प्रवचन के भी धन,
    लाखो लेते संतरूपी मॉडर्न बंजारे।
इनकी खोल की पोल खुले ना,
      बदल-बदल कर दूजा शहर पधारे ।
मदिरा ,नारी- नृत्य बीमारी,
         यही तो होते मॉडर्न बंजारे।

🎂समाप्त🎂  स्वरचित और मौलिक
                         सर्वाधिकार सुरक्षित
             लेखिका:-शशिलता पाण्डेय

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