रविवार, 16 अगस्त 2020

मैं मिलूंगा तुम्हे वही प्रिये


"मैं मिलूंगा तुम्हे वही प्रिये"
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विरह-वेदना से विकल प्रियतमा धरा ने,
 दिया पैगाम, कब मिलन हो? प्रियतम गगन से।
 भीगी अँखिया बाट जोहती प्रियतम दर्शन को ,
अचला तड़पती तन-बदन विरह वेदना से।
सुन संदेशा सजनी का मनमोदित गगन,
नाच उठे मन मयूर हो के मगन ।
 दूर क्षितिज में पर्वतों के  बीच मे,
"मैं मिलूंगा तुम्हें वही प्रिये"आलिंगन में।
आलोकित दिनकर छिटकता सिन्दूरी आभा जहाँ,
स्वर्णिम किरणे बिखरा दिखलाती दर्पण क्षण में।
सुन्दर रंगीले पुष्पों से हो अलंकृत प्रिये,
मिलन को बीच बृक्ष चिनारों की छुपकर ओट में।
तुम श्वेत धवल परिधान पहन सजाना तन को,
मैं"मिलूंगा तुम्हें वही प्रिये"उन श्वेत धवल बादलों में।
जहाँ इठलाती अद्भुत छेड़ती सरगम सरिता,
गाती तराने मिलन के रागिनी मधुर स्वर में ।
कलकल -छलछल बहते निर्झर,
 इठलाती बलखाती गंगा उतर-उतर पर्वतों से।
लहरा के छेड़ती राग बीणा के तारो के स्वर सी,
 गाती प्रणय-गीत टकराकर पत्थरों से।
"मैं मिलूंगा तुम्हे वही प्रिये"जहाँ घन बरसते,
 प्रणय -गीत गाते हो मधुर मिलन के।
डाली-डाली काली कोयल गीत गाती,
अपने धुन में सुनाती कोई राग ऐंठी।
झूमें पपीहा भी लेकर अपना तानपुरा,
पीहू-पीहू का संगीत सुनाता झूमकर।
मैं"मिलूंगा तुम्हे वहीं प्रिये"तेरे मेरे मिलन,
 का दिखता विहंगम दृश्य जहाँ से।
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स्वरचित और मौलिक
सर्वाधिकार सुरक्षित
रचनाकारा:-शशिलता पाण्डेय
बलिया (उत्तर प्रदेश)

Badlavmanch

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