सोमवार, 31 अगस्त 2020

अंतरराष्ट्रीय कवि निशांत वैद्य 'निश' जी द्वारा 'उम्मीद' विषय पर रचना


प्रिय उम्मीद

तू कब सुधरेगा? जबसे मेरी ज़िन्दगी की शुरूआत हुई है तबसे तू दिखा नहीं है? कहाँ है तू? क्यूँ सबसे ज़्यादा गाली मैं ही खाता हूँ? क्यूँ हमेशा मैं ही शर्मिंदा होता हूँ?
कब मेरे दिन बदलेगे?

कब तू सच्ची आएगा मेरी दुनिया में?
सब कहते है उम्मीद रखो? पर मुझे नज़र नहीं आ रहे?
क्या रास्ता भटक गए क्या? या भूल गए की मैं भी ज़िंदा हूँ? कब तक मैं यह सहन करूँगा? एक दिन टूट केे मर जाऊंगा| तब तुझे ख़ुशी होगी क्या? जब तुम दूसरे लोगों का भला कर सकते हो तोह मेरा क्यूँ नहीं? क्या दुश्मनी है मेरे से? मैंने क्या बिगाड़ा तेरा? क्यों मेरे से दूर रहते हो?

एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब मैंने पापा या दीदी या किसी और की डाँट न खाई हो? मैं इसके लिए पैदा हुआ हूँ क्या? मुझे दूसरे काम नहीं हैं क्या करने को?
रोज़ रोता हूँ तेरी वजह से| बस सपना दिखाते हो पर कुछ होता तोह है नहीं| जैसा बचपन था वैसा ही हूँ अभी| कुछ नहीं बदला है बस उमर बदल गयी है और कुछ नहीं| मुझे लोग कहते है उम्मीद रखो पर कब तक? कितना? मैं बस यहीं करता रहु? 

मेरे सब सपने तोह मिट्टी में मिल गए| मुझे कुछ दिख रहा है आगे का| अब तोह खुश है ना तू? तेरी इच्छा पूरी हो गयी|तू जो चाहता था वैसा ही हुआ|आगे भी अगर नहीं आना है तोह अभी से कह दो ऐसे झूठे सपने मत दिखाओ|

धन्यवाद


इंटरनेशनल कवि

निशांत वैद्य "निश"

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