रविवार, 2 अगस्त 2020

बदलाव मंच काव्य मिश्रित भाषण प्रतियोगिता

बदलाव साहित्य मंच साप्ताहिक प्रतियोगिता

बदलाव मंच काव्य मिश्रित भाषण प्रतियोगिता

विषय:-"स्वतंत्रता दिवस" पर काव्य-गद्य मिश्रित भाषण प्रतियोगिता

दिनांक--03-08-2020
दिन- रविवार

शीर्षक- आजादी की कीमत
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स्वरचित रचना
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हे  भारत  माँ    की   संतानों,
आजादी  की  कीमत  जानो।
हंसकर फांसी पर लटक गए,
उनके बलिदान को पहचानो।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय दीपक क्रांति जी, उपाध्यक्ष कमलेश कुमार गुप्ता जी, महासचिव अमित राज जी, विद्वान निर्णायक मंडल व  सुधी श्रोतागण। बदलाव मंच द्वारा आयोजित काव्य मिश्रित भाषण प्रतियोगिता में अपनी रचना जिसका शिर्षक है "आजादी की कीमत " के लिये अपने विचार लेकर उपस्थित हूँ। साथियों राष्ट्रीय पर्वों पर अकसर यह गीत सुनते हैं " दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल..।"  तब ऐसा लगता है कि क्या क्रांतिकारीयों का बलिदान व्यर्थ था? वास्तव में स्वतंत्रता संग्राम हमें सही से पढाया ही नहीं गया या दूसरे शब्दों में कहें तो आम जन से सच्चाई छिपाई गई ।  ऐसी ही कुछ बातें मे  बताने का प्रयास करूंगा।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीता पट्टाभिरमैया ने लिखा है कि स्वतंत्रता संग्राम के 80 प्रतिशत से अधिक क्रांतिकारी आर्य समाज से प्रभावित थे। 
           बात शुरू करते हैं आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती की। सन्यास ग्रहण कर वह आबू पर्वत पर साधना कर रहे थे। 1855 में हरिद्वार के कुंभ में शामिल होने के लिए वे वहां से पैदल चल पड़े। रास्ते में लोगों से अंग्रेजो द्वारा किए जा रहे अमानुषिक अत्याचारों की बातें सुनी और युवाओं को संघर्ष  के लिए तैयार रहने के लिए कहा। हरिद्वार में इनका संम्पर्क तांत्या टोपे, बाबु कुंवर सिंह, नाना साहब व अजीमुल्ला खाँ आदि से हुआ ओर सशस्त्र क्रांति की भूमिका तैयार हुई।
       29 मार्च,1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे की बन्दुक से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी उठी और पूरे भारत में फैल गई। मेरठ मैं भी छावनी मे सैनिक विद्रोह कर दिल्ली पहुंचे ओर 82 वर्षीय बहादुर शाह जफर को बादशाह धोषित कर दिया। 80 वर्षीय वीर कुवंर सिंह बिहार के जगदीशपुर में अंग्रेजो को छकाते रहे। नाना साहब ने कानपुर में संग्राम का नेतृत्व किया। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी पीठ पर दत्तक पुत्र दामोदर को बांध, घोड़े पर सवार होकर लड़ते-लड़ते झलकारी बाई व मोती बाई के साथ वीरगति प्राप्त की। रानी अवंतिबाई लोधी रेवांचल क्षेत्र में मुक्ति आन्दोलन की सूत्रधार रहीं।
      आदिवासी टंट्या मामा ने गोफन, तीर व बन्दुक से कई अंग्रेजो को ठिकाने लगाया। तांत्या टोपे ने इनको गुरिल्ला युद्ध में निपुण किया था और इनके साथ खानवा में अंग्रेजो को हराया था। समय से पूर्व बिना तैयारी के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति असफल रही।
         1873 मे स्वामी दयानंद कलकत्ता गए वहाँ लार्ड नार्थ क्रुक ने उनसे अपने प्रवचनों से पूर्व अंग्रेजी राज के कल्याण के लिए प्रार्थना करने को कहा तब स्वामी जी ने स्पष्ट रूप से इसके लिए मना कर दिया और कहा कि भारत को सम्मानित स्थान प्राप्त हो इसके लिए मैं यह प्रार्थना करूँगा की मेरे देशवासी विदेशी सत्ता के जुए से शीघ्रताशीघ्र मुक्त हों।
      दयानंद जी के शिष्य स्वामी श्रद्धानंद ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के समय 30  मार्च,1919 को दिल्ली में जुलूस का नेतृत्व करते हुए सैनिकों द्वारा रोकने पर अपना सीना तानकर संगीन के टिका दिया और गरजकर बोले चलाओ गोली। उनकी हिम्मत देख अफसर ने सिपाहियों को पीछे हटा लिया। 
       स्वामी दयानंद जी से प्रेरित श्याम जी कृष्ण वर्मा ने इंग्लैंड में जाकर इंडिया हाऊस कि स्थापना करी। जहाँ क्रांतिकारी मिलकर भारत की स्वतंत्रता की योजना बनाते थे। श्याम जी वीर सावरकर, मदनलाल धींगड़ा, लाला हरदयाल तथा विदशों में सर्वप्रथम भारतीय ध्वज फहराने वाली वीरांगना भीकाजी कामा के प्रेरणा स्त्रोत थे। भगत सिंह के दादाजी स्वामी दयानंद के शिष्य थे।
          गरमदल से जुड़े लाला लाजपतराय आर्य समाज को अपनी माता कहते थे। साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान 30 अक्टूबर,1928 को अंग्रेजो की लाठियों से धायल होने से उनका देहांत हो गया।
-वीर सावरकर अग्रिम पंक्ति के क्रांतिकारी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। 10 साल तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में कालेपानी की यातनाओं को भुगता।
-मदनलाल धींगड़ा ने इंग्लैंड मे अध्ययन के दौरान 25 वर्ष की आयु में अंग्रेजो के लिए भारतीयों से जासूसी करवाने वाले ब्रिटिश अधिकारी विलियम हंट कर्जन वाइली को गोली मारी।
-राम प्रसाद बिस्मिल ने दयानंद सरस्वती लिखित सत्यार्थ प्रकाश पढा व स्वामी सोमदेव जी के साथ राजनीतिक चर्चाओं से उनके मन मे देश प्रेम की भावना जाग्रत हुई। क्रांतिकारियों का साथ दिया। सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मैं है... लिखा। काकोरी कांड में फांसी हुई।
-चन्द्रशेखर आजाद ने 1921 के असहयोग आंदोलन में पकड़े जाने पर अपना नाम आजाद बताया व मारी गई हर बेंत के साथ भारत माता की जय का नारा लगाया। अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फैंकने के लिए संघर्ष करते हुए बलिदान हो गए।
-भगवती चरण बोहरा व उनकी पत्नी दुर्गा देवी बोहरा ने अपनी धन संपत्ति क्रांति के लिए अर्पित कर दी। चन्द्रशेखर आजाद के कहने पर फिलासफी आफ बम दस्तावेज तैयार किया। 28 मई ,1930 को रावी नदी के तट पर बम का परीक्षण करते हुए शहीद हो गए। बाद में भी दुर्गा भाभी क्रांतिकारियों का साथ देती रही।
-द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 1942 में रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से आजाद हिंद फौज का गठन किया। सुभाषचंद्र बोस ने 1943 में सिंगापुर रेडियो पर जब स्वतंत्रता का उद्धधोष किया तो 4 जुलाई, 1943 को रासबिहारी बोस ने नेताजी को आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सोंप दिया। नेताजी ने नारा दिया " तुम मुझे खुन दो मैं तुम्हें आजादी दुंगा" । अण्डमान पर उनका अधिकार हो गया था।
      कांग्रेस तो सरकार में सिर्फ हिस्सेदारी चाहती थी लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की परीस्थितियों के कारण व क्रांतिकारियों की बढती गतिविधियों के कारण अंग्रेजों को भारत छोड़ भागना पड़ा। साथियों यह वो वास्तविकता है जिससे हमारी युवा पीढ़ी अन्जान है। हमारे शहीद क्रांतिकारियों के सम्मान में व युवा पीढ़ी को प्रेरणा देने के लिए प्रस्तुत है रचना 'आजादी की कीमत जानो'

हे  भारत  माँ    की   संतानों,
आजादी  की  कीमत  जानो।
हंसकर फांसी पर लटक गए,
उनके बलिदान को पहचानो।

बिरवा मुक्ति  का  बोया  था,
अपने शोणित से सींचा था।
फिर खाद पड़ी नरमुंडों की,
क्रांति का  अंकुर  फूटा  था।

इतिहास पढ़ो तुम वीरों का,
मन में  नव जोश  जगाएगा।
बातों से मिली  थी आजादी,
यह भ्रम  सारा मिट जाएगा।

सत्तावन  से   सैतालिस   तक,
बलिदान  की  कई   कहानी है।
बलिदान की  कदर करो   रमेश,
यह बेकदरों को यह समझाना है।

संघर्ष से सब पा सकते हैं,
मेहनत से ना  घबराना है।
तुम काम करो   युवा ऐसा,
भारत की शान बढाना है।

हे  भारत  माँ    की   संतानों,
आजादी  की  कीमत  जानो।
हंसकर फांसी पर लटक गए,
उनके बलिदान को पहचानो।

जय हिंद, भारत माता की जय।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
नाम-रमेश चंद्र भाट
पता-टाईप-4/61-सी,
अणुआशा कालोनी,
रावतभाटा।
मो.9413356728

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