रविवार, 30 अगस्त 2020

कवि व लेखक रामबाबू शर्मा जी द्वारा 'लघुकथा'

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        लेख- लघुकथा गद्य विधा
         दिनांक - 30.8.2020
       घोषणा- यह घोषणा की जाती है कि यह मेरी स्वरचित रचना है।
       
               *लघुकथा*
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            आधुनिकता की इस चकाचौंध ने गांव के एक सीधे साधे डमरू बाबा के मन में यह कुंठा पैदा कर दी कि सारे दिन इतनी मेहनत करने के बाद भी बच्चों का लालन-पालन ठीक ढंग से नहीं हो पाता,इसी उधेड़बुन में कई दिनों से वो बदला-बदला सा नजर आने लगा।उसकी लाड़ली मुनियां से रहा नहीं गया और एक दिन पूछ  ही लिया बाबा आखिर बात क्या है, बहुत दिनों से चेहरे पर उदासी है?
           इतना सुनते ही वो अपने मन के भाव छुपाता हुआ बोला कुछ नहीं जा तू अपना काम कर,पर वो उस बाल मन के आगे हार गया और मन का सारा राज बताकर शहर जाकर मजदूरी करने की अपनी इच्छा को प्रकट करने से रोक नहीं पाया।
              अपनी बकरी को आनन फानन में बेचकर,न जाने कितने सपने देखते देखते कब उसकी आंख लग गई और सुबह उठते ही एक पुराने से कपड़े में एक समय की रोटी व थोड़ा सा गुड़ लेकर शहर की उस हवा में जाने को आतुर,जोर जोर से कदम बढ़ाकर बस की ओर चल पड़ा।इस गम की घड़ी को उसका परिवार एक टक देखता ही रह गया!
        शहर जाकर बड़े जोश और उल्लास से वह काम की तलाश में लग गया ।आखिर बहुत जल्दी ही शहर की वो हवा उसके रास नहीं आई,जिसमें न कोई अपना न कोई पराया,सबकी अपनी-अपनी दुनियां। जितना कमाया उतना ही खर्चा,सोच-सोच कर उसका मन भर आया, बहुत जल्दी ही वह वापस अपने गांव की छाया में आया।
           धीरे-धीरे वापस काम शुरू किया फिर से वो बकरी का मीठा दूध सबके मन भाया। डमरू बाबा के घर आने से रोनक आ गई  फिर से घर आंगन में खुशी की लहर छा गई।।
     
रामबाबू शर्मा, राजस्थानी,दौसा(राज.)

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