सोमवार, 10 अगस्त 2020

अनकहा

बदला मंच को नमन
एक कविता प्रस्तुत
कविता का शीर्षक- अनकहा

कुछ कहा
सब कुछ कहा
फिर क्यों लगा सब अनकहा

रूप था श्रृंगारग था
रस का भंडार था
था अलंकारों से अलंकृत
रग रग में उसके प्यार था
फिर क्यों लगा सब अनकहा

चौपाई थी छंद थे
खोरठा दोहा भी थे
वो नव रसों से सुसज्जित
फिर क्यों लगा सब अनकहा

थी असीम शक्ति उसमें
की असीम भक्ति उसमें
लक्ष्य पर थी आंख उसकी
लेकर विजय ध्वज वो बढ़ा था
पद रज की चुनकर
जय कार से गूंजा गगन
झूमकर थे सब मगन
फिर क्यों लगा सब अनकहा

पल भर में ही मौन क्यों सब हो गए
कौन से स्वप्न में सब खो गए
कि कौन सी वह बात ऐसी
कोई न कुछ कह रहा था
क्या रह गया था अनकहा
सब कुछ था समर्पित
कुछ भी नहीं था शेष लेकिन
फिर क्यों लगा सब अनकहा
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मैं घोषणा करता हूं कि यह रचना मौलिक स्वरचित है।
भास्कर सिंह माणिक (कवि एवं समीक्षक) कोंच, जनपद -जालौन, उत्तर- प्रदेश-285205

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