सोमवार, 10 अगस्त 2020

पतझड़ -पेड़ -सम डाली बन जाती है

!! पतझड़ -पेड़ -सम डाली बन जाती है !!

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प्रिय के वियोग में ,
प्रिया की आंखें ऐसी हुईँ ,
जैसे शाम सूरज की ,
लाली बन जाती है ।
चेहरे की गुलाबी गई ,
आँखों की शबाबी गई ,
रोते -रोते आन्शुओँ की,
प्याली बन जाती है ।।
खड़ी- खड़ी सहमी सी ,
रहे जैसे बहमी सी ,
पागलों की भांति ,
मतबाली बन जाती है ।
मृदुता सरीखी देह ,
सूख-सूख क्षार भई ,
पतझड़ -पेड़- सम ,
डाली बन जाती है ।।

डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज"
अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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