रविवार, 19 जुलाई 2020

गाँव चले जाएँगे

गाँव चले जाएँगे
"""""""""""""""""""""''''"
उसे आभाव की कसक ले आई,
गरीब को भूख की हवस ले आई।
सुबह उसने घर के चौखट लांघी,
शाम तक शहर उसे बस ले आई।।
यहाँ वो अपना पहचान खो गया,
भूखे पेट फुटपात पर सो गया।
शहर में कहाँ कोई अपना होता है,
सुने आँखों में सिर्फ सपना होता है।।
यहाँ तो बस ऊँचा मकान होता है,
लोगों का यही पहचान होता है।
पास पैसा है तो सबलोग मान देते हैं,
गरीबों को कहाँ लोग सम्मान देते हैं।।
देख रीति शहर की वह बोल ना पाया,
अमीरों के आगे वह मुख खोल ना पाया।
आज उसे अपना गाँव याद आ रही थी,
गाँव की मिट्टी उसे वापस बुला रही थी।।
गाँव में जहाँ किशोरी शरमाती है,
पबों में जवानी यहाँ धूम मचाती है।
गाँव में जो बच्चों को लोरी सुनाती है,
वो माँ यहाँ डिस्को में गाना गाती है।।
गाँव में लोग मिलकर छप्पर उठाते हैं,
जीवन भर लोग यहाँ चार कंधे जुटाते हैं।
रिश्ते जो गाँव में खुशी खुशी निभाई जाते हैं,
वही रिश्तेदार यहाँ बोझ समझे जाते हैं।।
अब इस शहर के बोझ को हम ना सह पाएँगे,
गाँव जाकर लोगों को क्या मुँह दिखाएंगे।
बाँध लिया है हमनें अपना सामान,
शाम की गाड़ी से हम गाँव चले जाएँगे।।
हाँ हम फिर गाँव चले जाएँगे।।
               ©सुजीत संगम
                       बाँका

Badlavmanch

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें