गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कोरा कागज़

*कोरा कागज*
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जब होता है जन्म हमारा
कोरा कागज होता है मन हमारा
मां-बाप का ही होता है तब सहारा
क्योंकि हम होते हैंबेबस-बेसहारा।
बेशक कोरा कागज होता है मन हमारा
लेकिन लेखनी पर नहीं होता कोई जोर हमारा
क्योंकि लेखनी हमारी होती है मां-बाप के हाथ।
लेखनी से वो ही लिखते हैं हमारा भाग्य
वो चाहे तो लिखें खुदा चाहे लिखें राम
वो चाहे तो लिखें गीता चाहे लिखें कुरान
हमें नहीं होता उनके लिखने से कुछ इंकार
हम तो बस वही पढ़ते हैं जो मां-बाप हमारे 
इस कोरे कागज पर लिखते हैं
वो चाहें तो लिख दें सत्य-अहिंसा का ज्ञान
वो चाहे तो लिख दें राग-द्वेष अभिमान
क्योंकि लेखनी हमारी होती है उन्हीं के हाथ
बस कोरा कागज होता है हमारे पास।
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स्वरचित- सुनील कुमार
पता- ग्राम फुटहा कुआं 
निकट पुलिस लाइन
जिला- बहराइच- उत्तर प्रदेश।
मोबाइल नं.- 6388172360

Badlavmanch

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