रविवार, 12 जुलाई 2020

थोड़ा सा बदल जा मेरे अन्नदाता


थोड़ा सा बदल जा मेरे अन्नदाता

अन्नपत्ते की व्यथा सुनाता,
धरा फाड़ वह अन्न उगाता |
बाढ़ अकाल बेमौसम ओले,
सब प्रकोप जो सह जाता |
माटी से कुछ पाने को वो,
माटी सा हो जाता |
पैदा करके भी वो वंचित,
जमाखोर है मौज उड़ाता |
अन्नपत्ते ओ अन्न के दाता,
क्यो तू वंचित ही रह जाता ||१||

रूपया एक सरकार देती थी,
पन्द्रह पैसे तुझ तक आता |
नेता अफसर ठेकेदार भ्रष्ट,
बाकी ईनकी जेब में जाता |
फ़ाइल में तालाब खुदे,
और फ़ाइल में ही बह जाता |
भ्रष्टाचारी कारिन्दों से,
पार नहीं तू पा पाता |
अन्नपत्ते ओ अन्न के दाता,
क्यो तू वंचित ही रह जाता ||२||

जितना तू परिवार बढ़ाता,
खेत का छोटा टुकड़ा पाता |
खेती पानी नहीं बचा तब,
मजदूरी करने को जाता |
गोपालन कर दूध पिलाता,
जैविक खाद बनाता |
सहकारिता यदि अपनाता,
मिलकर लाभ कमाता |
इतना सा बदलाव जो लाता,
फिर तू वंचित ना रह पाता |

कमियां कुछ तुझमें भी है,
कुछ समाज भी समझ ना पाता |
साथ समय के चला नहीं जो,
पिछे ही वह रह जाता |
शिक्षा से जोड़ा ना नाता,
नवीन ज्ञान कहां से पाता |
देख कृषि दर्शन टी वी पर,
प्रोढ शिक्षा को भी अपनाता |
इतना सा बदलाव जो लाता,
फिर तू वंचित ना रह पाता ||४||

स्किल डेवलपमेंट कर अपना,
नये तरीकों को अपनाता |
कृषि क्षेत्र की खोजों का,
लाभ यदि तूं ले पाता |
मृदा स्वास्थ कार्ड बनाता,
जैविक खेती भी अपनाता |
पानी की जहॉ कमी पड़े,
वहॉ बूंद बूंद से फ़सल उगाता|
इतना सा बदलाव जो लाता,
फिर तू वंचित ना रह पाता ||५||

जनम मरण और परण के उत्सव,
समझदारी से यदि मनाता |
मृत्यु भोज और बाल विवाह तज,
बच्यों को शिक्षित कर पाता |
सामूहिक सम्मेलन करके,
अन्न धन और समय बचाता |
साहूकार के फंदे से बच,
बिना कर्ज के तू जी पाता |
कह 'रमेश' ओ अन्न के दाता,
फिर तूं वंचित ना रह पाता||६||
इतना सा बदलाव जो लाता,फिर तूं वंचित ना रह पाता||
अन्नपत्ते ओ अन्न के दाता,फिर तूं वंचित ना रह पाता||
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
नाम-रमेश चंद्र भाट
रावभाटा, जिला-चितौड़गढ़, राजस्थान

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