बुधवार, 15 जुलाई 2020

डर के आगे जीत


          **डर के आगे जीत* 

कहते है ना "डर के आगे जीत है"",और बेशक इस डर को जीतने के लिए जरूरी है , आत्मविश्वास को बरकरार रखना । 
निःसंदेह आत्मीय शक्तियों को एकरूप बनाये रखने के लिए उतश्रृंखल  मन पर नियंत्रण रखना अत्यंत आवश्यक है , क्योंकि यह जितनी जल्दी उल्लसित हो उठता है, उतनी ही आसानी से पस्त भी हो जाया करता है । यह बात सोलह उसने सच है कि "मन के जीते जीत है, मन के हारे हार,,"
जिसके लिए जरूरी है स्वयं को नकारात्मकता से पूर्णतः विलग रखना ।
    वर्तमान कोरोना महामारी काल मे स्वयं को सकारात्मक बनाये रखने के लिए मध्य प्रदेश लेखिका संघ समूह में सम्पूर्ण लॉक डाउन पीरियड में प्रतिदिन एक साहित्यिक प्रतियोगिता में सहभागिता की, साथ ही अन्य साहित्यिक समूहों में आलेख, कविता लेखन आदि  प्रतियोगिताओं के अलावा ऑन लाइन काव्य गोष्ठियों में सम्मिलित होना भी एक उर्जसित करने वाला अनुभव रहा । 
विषम परिस्थितियों से जूझने को प्रोत्साहित करती कहानियां आलेख लेखन पर पाठकों से  मिली प्रतिक्रिया ने नख-शिखान्त साहित्य सेवा में सतत रत रहने का जज़्बा जगाया । इसके साथ हर दिन  पुराने गानों को सुनकर मन को तरोताज़ा बना लिया करती ।

अंजली  खेर 9425810540
C- 206 जीवन विहार
अन्नपूर्णा बिल्डिंग के पास
P&t चौराहा, कोटरा रॉड
भोपाल 462 003 
म प्र

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**-""हम रह गए दंग""**

मतलब परस्त बेगानी सी दुनिया
पलक झपकते ही गिरगिट से 
लोग बदलते अपने रंग,,
रिश्तों के बदलते तेवर देख
हम सब हो जाते दंग,,,,,

दोस्ती के नाम पर धोखा
अपने - अपनों से करें फरेब
मालिकाना हक की ख़ातिर
भाई -भाई में छिड़ जाती जंग,,,
रिश्तों के बदलते तेवर देख
हम सब रह जाते दंग,,,,

राम नाम की माला जापे
पीठ पर वार करने से न चूके
सद्कर्मों से वास्ता न दूर तक
प्रवचन दे बन बैठे मलंग,,,
रिश्तों के बदलते तेवर देख
हम सब रह जाते दंग,,,

कोरोना महामारी ने समाज के
मुख़ौटे खोले कुछ चंद
लॉक डाउन में कैसे कैसे
छिड़ गयी दंपत्तियों में जंग
रिश्तों के बदलते तेवर देख
हम सब हो गए दंग,,,

कोरोना का खौफ इतना 
बेटे ने मुखाग्नि से मुँह लिया फेर
मजदूर पटरियों पर भागते भागते
जिंदगी की लड़ रहा है जंग
बदलते रिश्तों के तेवर देख
हम सब हो गए है दंग,


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   ** एक निर्णय ऐसा भी,,,** 

प्यार करना यदि गुनाह है
तो हा,, ये गुनाह मैने किया था,,,
संग उसके जीवन बिताने का
एक ख्वाब भी मैने बुना था,,,

छोड़ जग को सारे, मैं तो
प्रीत में उसके रंग सी गयी,
खुद को जैसे भूलकर ही
उसके नाम से बंध सी गयी,,

न जाने प्रीत को  हमारी 
लगी किसकी बुरी नज़र,,,,
आंखों ही आंखों में कटती
मेरी सुबह, शाम दोपहर,,,,

प्यार की जगह आंखों से उसके
बरसा करते आग के शोले,,,
नशे में होकर धुत्त उसके कदम
बस इधर-उधर बढ़ते डोले,,

नन्ही किट्टू के आने पर
भी जब बनी न कोई बात,,,
भलाई बस यही लगने लगी
कि छोड़ दूं मैं उसका हाथ,,,,

समझाने की कोशिशें नाकाम हुई
झट मैंने निर्णय एक लिया,,,
संग बेटी के अलग हो ली
जीवन से उसको विलग किया,,,,
,,

 जिसके संग जिंदगी जीने का
सपना  खुली आंख से देखा था,,
पल भर में कांच की तरह बिखरा
दुख यही,, तोड़ने वाला अपना था,,,
 
आत्मनिर्भर थी मैं, आश्रित नही
निर्णय अपने लेना जानती थी,,
 नन्ही बिटिया को माँ-बाप का
प्यार देना भी जानती थी,,,

दिन-माह गुजरे, स्कूल के फॉर्म में
"बिटिया का पूरा नाम" लिखने की बारी आई,,,
मै बुरी यादों को तुरत बिसराकर
बेटी के साथ अपना नाम भर आईं,,,

भावनाओं को न समझे
आदर करना भी न जाने,,,
उसको हम दिल से कैसे
अपना जीवन साथी मानें,,,

देखकर जिसे, दिल खुशी से न झूमे
वो भला कब अपना सा है,,,
बेहतर है भुला दे संग उसका
जो जिंदगी का बुरा सपना सा है,,,

नाम :- अंजली खेर
उम्र :- 45 वर्ष
पता- c 206 जीवन विहार
अन्नपूर्णा बिल्डिंग के पास, 
कोटरा रॉड, p&t चौराहा
भोपाल म प्र- 462 003

मेल आईडी anjalikher73@gmail.com

            -4-

**सोलह श्रृंगार***

खेत पर घंटो चिलमिलाती धूप में हल जोतते केशव को खाना खिलाकर पोटली लेकर वापस जा‍ती सुखिया को जाते देख केशव सोचता हैं कि पिछले चार साल से सुखिया की एक ही तो ख्‍वाहिश थी कि सावन में मायके जाये तो सोलह श्रृंगार करके जाये ।
 पर क्‍या करें !!!  हर बार कोई न कोई नया खर्चा,, और उपर से मौसम के रोने,,, काश कि इस बार जम के मेघ बरसे,, अच्‍छी फसल हो!!!!

शाम ढ़लते केशव घर पहुंचा,,, उमस अपनी चरम पर थी ।  सबको खाना खिलाकर रसोई समेट गर्मी से हलाकान रमिया देर रात कमरे में आई तो थककर चूर हो चुकी थी । लेटते ही नींद के आगोश में हो चली रमिया की ओर प्यार से निहार केशव छत पर पड़ी पन्‍नी से झांकती चांदनी की ओर देखता भारी वर्षा की कामना करते करवट ले सो जाता हैं ।

रात्रि के दूसरे पहर ही बिजली की चकाचौंध के साथ गरज-बरस के साथ पड़ती बौछारों की आवाज़ से केशव की नींद खुल गई ।

 उसकी खुशी का ठिकाना न था यह सोचकर कि अबकी रमिया को सोलह श्रृंगार कर   मायके भेज पायेगा  ।

अंजली खेर
C-206,-जीवन विहार
P&t चौराहा
अन्नपूर्णा बिल्डिंग के पास
कोटरा रोड भोपाल


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       **''कोरोना से डरो ना,,,**

शहर को जाने वाले रास्‍ते में सुल्‍तानपुर गांव में बने ढ़ाबे पर लोगों की आवाजाही बनी रहती ।  देशभर में फैली कोरोना महामारी के फैलते मकड़जाल को लेकर गांव के बुजुर्ग किसानों ने शाम चबूतरे पर बैठ एक बहुत ही प्रशंसनीय और अनुकरणीय निर्णय लिया ।
अगले दिन निर्णय को कार्यरूप में प्रस्‍तुत करने के लिए सारी तैयारियां की गई । तत्‍पश्‍चात सरपंच के एक ट्रेक्‍टर में सेनेटाइज़र मशीन फिट की गई और बारी-बारी से गांव के एक-एक किसान प्रतिदिन सुबह-शाम पूरे गांव में सेनेटाइज़र का छिड़काव किया गरते,,, आखिर कोरोना की जंग मिलकर ही तो लड़नी हैं, उससे ड़रकर तो जिया नहीं जा सकता न,,,,

अंजली खेर
C-206, जीवन विहार
अन्नपूर्णा बिल्डिंग के पास
P&t चौराहा कोटरा रोड भोपाल


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##बेटा किसान का,,,,,##

      लक्ष्‍मण के खानदान में पुश्‍तों से सभी पीढ़ी-दर-पीढ़ी खेती-किसानी ही करते आये है । पर गांव में बत्‍ती वाली गाड़ी में बड़े साहब की यदा-कदा आवाज़ही ने न जाने कब-कैसे लक्ष्‍मण के दिलो-दिमाग में अपने लाड़ले के भविष्‍य का एक तानाबाना बुन लिया था ।

      गांव से शहर जा बसे सुकेश से मुलाकात कर उसने बेटे राघव के रहने की व्‍यवस्‍था सुकेश के घर के उपर बने एक कमरे में कर दी, साथ ही खाने-पीने की व्‍यवस्‍था सुकेश के घर ही कर वह निश्चिंत हो गया था ।

    पढ़ने में अव्‍वल राघव के 12वीं कक्षा में मेरिट में आने की खबर पूरे गांव में विजली की कोंध सी फैलते ही लक्ष्‍मण गांव भर में मिठाई बांट आया था । साथ ही बेटे के प्रशासनिक सेवा में भर्ती हेतु कोचिंग आदि की व्‍यवस्‍था हेतु अपनी सारी बचत लगा दी ।
बेटे ने पिता को मायूस न होने दिया,, वह दिन भी आ गया जब गांव का सरपंच लक्ष्‍मण के घर किलो भर मिठाई और समाचार पत्र लेकर जा पहुंचा ।अपने बेटे की फोटो पेपर में देख लक्ष्‍मण की आंखों से आंसू थम ही नहीं रहे थे । सरपंच ने खबर पढ़कर सुनाई –''किसान का बेटा ए आई आर रेंक-10''

अंजली खेर
C-206 जीवन विहार
अन्नपूर्णा बिल्डिंग के पास
कोटरा रॉड भोपाल


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   ##लॉक डाउन के बहाने,,,,##

शहर में बड़ी-बड़ी कंपनियों में नौकरी करने वाले दोनों भाइयों ने तो गांव की पुश्‍तैनी हवेली से अपने हिस्‍सा मांग कर बेच दिया और सालों से गांवों में रहने वाले अपने भाई मंगलसिंह की खबर भी न ली थी ।

पर कोरोना के चलते लगे लंबे लॉकडाउन काल में कंपनियों में हुछ छंटनी के कारण बेरोज़गार हुए दोनों भाइयों ने अंतत: गांव में रह रहे अपने भाई की शरण में ही आना पड़ा ।
खेती-किसानी से गुज़ारा करने वाले मंगलसिंह का दिल बड़ा था । दर पर आश्रय की दया की कामना लेकर आये दोनों भाइयों का उसे गले लगाकर स्‍वागत किया ।
फिर दोनों भाइयों ने भी शहर वापस जाने का निर्णय बदल दिया । 
फिर क्‍या था,,,, मंगलसिंह और उसके बेटे खेतों में काम करते,, तो दोनों भाई उनके शहरों में परिचित व्‍यवसायियों से मिल-जुलकर फल-सब्‍जी शहरों में विक्रय में मदद करने लगे । यही तो हैं ''सबका साथ – सबका विकास ।''

अंजली खेर
C-206, जीवन विहार
अन्नपूर्णा बिल्डिंग के पास
कोटरा रोड
भोपाल

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##ऐसी भी सोच,,,,,##

जैसे-तैसे गुज़र-बसर करते कन्‍हैया ने सरकारी नौकरी की चाहत में अपने एकलौते बेटे को उसके मामा के घर सहारनपुर भेजा । 
पर अपने पिता और गांव के प्रति असीम प्रेम रखने वाले बेटे भूषण के मन में तो कुछ अलग ही ताने-बाने बुन रहे थे ।
बहुत ही नियोजित तरीके से भूषण ने नौकरी के विचार को तिलांजलि दे एग्रीकल्‍चर में मास्‍टर डिग्री लेना तय किया और खेती-किसानी की नवीन प्रविधियों को बखूबी समझते हुए वापस गांव में आकर खेती की बारीकियों को गांववालों को समझाते हुए नई नस्‍लों की पैदावार की बातें सिखाई ।

सरपंच और एन जी ओ  की मदद से नई तकनीकों को गांव के खेतों में अपनाया गया । कुछ ही महीनों में गांव की फसलों की शहरों में बढ़ती मांग से आस-पास के इलाकों में गांव का नाम रोशन होने लगा ।

कन्‍हैया का बेटा भूषण अब पूरे गांववालों का लाड़ला लाल बन गया था ।

अंजली खेर 9425810540
सी-206, जीवन विहार 
अन्‍नपूर्णा बिल्डिंग के पास
पी एंड टी चौराहा, कोटरा रोड 
भोपाल- 462 003

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