गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कभी था यहाँ खूबरत सा समा, मेरे वतन में।**अब हो गया हर शख्स़ बदगुमाँ, मेरे वतन में।*

*काश* 
काश मेरे दिल को छू पाओ तुम
 बिन कहे मेरे मुझे समझ जाओ तुम
दिल  मेरा मोम सा पिघल रहा
काश इस धड़कन के रहते आ जाओ तुम
जल जल कर मिटने की कहानी सुन पाओ तुम
दिले अरमान  पहाड़ों पर जमी बर्फ में हैं दब रहे
काश इस छटपन के रहते आ जाओ तुम
हंसी की खनक में सिसकती कसक सुन पाओ तुम
मन - ज़मीन पर  यादों के फूल हैं खिल रहे
 काश इस खुशबू के रहते आ जाओ तुम
मेरे आलिंगन में हर फूल को स्पर्श कर पाओ तुम
ख्वाहिशों की पोटली हल्की होती जा रही
काश प्राण पखेरू उड़ने से पहले आ पाओ तुम
मर्यादा में लिपटा हुआ एक गहना मुझे पहनाओ तुम

मैं डॉ. शिवा अग्रवाल यह प्रमाणित करती हूं कि यह मेरी मौलिक रचना है।

Badlavmanch

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें