रविवार, 12 जुलाई 2020

प्रेमचंद साहित्य और परिवर्तन

प्रेमचंद साहित्य और परिवर्तन

जब जीवन में हो निराशा 
अवसाद का अँधेरा ।
मन उचट जाए 
ना दिखे कहीं सवेरा ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !

तब प्रेमचंद की मायावी 
नगरी में चले आना ,
कभी कर्मभूमि में,
कायाकल्प कर जाना ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


कभी वरदान पाना 
कभी प्रतिज्ञा कर जाना ,
कभी रंगभूमि को 
सेवा सदन बनाना ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


संवेदना जज्बातें उर में 
ऐसा उफान आएगा ।
अवसाद चिंता तिमिर ,
तम सब दूर हट जाएगा ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !

कहीं ईदगाह का हामिद ,
मासूमियत सिखाएगा ।
कभी हीरे -मोती का जोड़ा ,
प्रेम की भाषा समझाएगा ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


ठेठ ग्रामीण परिवेश का 
हवा सुकून पहुंचाएगा ।
भारतीय संस्कृति की ,
गरिमा गान गुनगुनाएगा ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


चलचित्र पात्रों का 
सामने यूं चलेगा ।
जीवन मर्म दर्शन
तू सब समझ लेगा ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


सामाजिक कुरीतियाँ 
और विषमताएँ ।
कुठाराघात अनोखा ,
ऐसा ना देखा कहीं उपमायें ।।


रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


साहित्य की अस्मिता,
गरिमा का बखान ।
साहित्यिक धरोहर है ये,
पगले इसे पहचान ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


प्रगतिशीलता की झलक 
क्या सर्वांगीण थी ।
क्या सोच विस्तृत ,
व्यापक बड़ी थी ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


शब्दों का मर्म भेदी बाण ,
जाने कितना चलाया था ।
पता नहीं  क्या वह 
अनुसंधान रात दिन किया था ।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !



उपन्यास सम्राट को 
हमारा नमन ।
उनके चरण रज को,
नम्र अभिनंदन ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !



कलम लिखती नहीं,
बोलती थी इनकी ।
शब्द -शब्द नहीं ,
औजार थे इनके ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !



कसक था , टीस थी।
मार्मिकता थी यथार्थता थी ।
लेखनी नहीं ,जीवंत प्रतिमा थी ।
वाह रे शिल्पकार ! क्या कथा शिल्प थी ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


इनकी रचनाएँ इनकी लेखनी ज
जनमानस का दर्पण है ।
आत्म शांति की खुराक ,
साहित्य देवी का अर्चन है ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


कल्पना नहीं ,फंतासी नहीं ,
वास्तविक स्वरूप दर्शन है।
जुल्मों सितम का चित्रण ,
परतंत्रता का दंश विवरण है ।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


देश प्रेम में सराबोर है ,
अद्भुत रसीला रस है ।
परिवर्तन कर सकता है ,
पारस मणि बन सकता है।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


विचार क्रांति  अभियान ला सकता है ,
हवा का रुख बदल मशाल जला सकता है।
धार्मिक उन्माद ध्वस्त कर ,
मार्ग प्रशस्त कर सकता है।।

रे मन होना ना उदास
होगा भोर होगाजल्द सवेरा !


अंशु प्रिया अग्रवाल 
मस्कट ओमान स्वरचित

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