शनिवार, 11 जुलाई 2020

बेवफ़ा शहर

बेवफा शहर
दुनिया को छोड़कर जाने से
 पहले गाँव जाना चाहूँगा।
इस सृष्टि से विदा लेने से 
पहले मैं वही पीपल का छाँव चाहूँगा।
यदि मौका मिल सकेगा तो सायद
मैं मरने से पहले जी जाऊ।
मृत्यु का तांडव सहने से पहले
मैं ठंडे हवाओं का रस पी जाऊ।।
गाँव तो वास्तव में अपना है।
शहर तो मात्र दिखावटी व सपना है।
गाँव में मरना भी सुकून है।
शहर में जीने के लिए 
भी कालाकानून है।।
गाँव में जाकर ही चैन से
 मरा जा सकता है।
शहर मे चैन से दो पल में 
भी नही पड़ा जा सकता है ।।
गाँव में कुछ होने पर
 सारे लोग आ जाते है।
शहर में तो जीते जी ही
 तन्हाई से मर जाते है।
गाँव में पानी के  लिए नलके है।
शहर में तो चाय भी
 होता नशीब में बल से है।
इसलिये गाँव में ही जाकर रहना चाहता हूँ।
रह गया हूँ होकर बेबफा शहर में इसलिये
अबतो अपने माँ के आँचल के
 छाँव में चले जाना चाहता हूँ।
शहर के दमघोटू में जीने से अच्छा
गाँव के सुकून में मरना चाहता हूँ।

प्रकाश कुमार
मधुबनी, बिहार
9560205841

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