गुरुवार, 9 जुलाई 2020

ग़ुरूर था अश्कों को भी अपने वजूद का,वो भी गिर गये अब इंसानों के मानिंद..

*ग़ुरूर था अश्कों को भी अपने वजूद का,
वो भी गिर गये अब इंसानों के मानिंद..*

रुसवाई  मिलती है इश्क़ में.. 
रूह कहाँ सम्भलती है इश्क़ में..

हुईं  बर्बाद इश्क़ में न जाने कितनी ही ज़िंदगियाँ... 
फिर भी मिटा न पाईं  तहरीर-ए-इश्क़ को पाबंदियाँ...
*दीपक क्रांति*

Badlavmanch

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